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बैंकों का राष्ट्रीयकरण खत्म करें मोदी

2 वर्ष पहले
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दोहराव का जोखिम लेकर मैं यह कहावत कहूंगा : किसी संकट को बर्बाद मत होने दीजिए। कहावत कभी अमल में नहीं लाई जाती, क्योंकि इसके लिए लगता है साहस। नौकरशाहों, समय काटने वालों और जोखिम विरोधी लोगों का यह विकल्प नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इनमें से कोई नहीं हैं। वे इंदिरा गांधी के बाद हमारी राजनीति में जोखिम लेने वाले सबसे बड़े नेता हैं। मजे की बात है कि हम उनसे जहां साहस दिखाने की अपेक्षा कर रहे हैं वह इंदिरा गांधी का ही सबसे साहसी व विनाशकारी कदम था। 


जब 1969 में उन्होंने कांग्रेस का विभाजन किया तो उन्होंने बड़े व्यावसायिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा कर दी। 1991 के सुधार तक और अधिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। सारी बीमा कंपनियों के राष्ट्रीयकरण और विकास संबंधी वित्तीय संस्थाएं सरकारी स्वामित्व की होने के साथ उन्होंने औपचारिक वित्तीय क्षेत्र पर सरकार का पूरा नियंत्रण स्थापित कर दिया। अपने फर्जी समाजवाद के लिए उन्हें चुनाव दर चुनाव इनाम मिलता रहा, क्योंकि उन्होंने गरीबों को यकीन दिला दिया कि वे अमीरों को चोट पहुंचा रही हैं और आगे जाकर उनके लिए भी कुछ करेंगी।


ऐसा कुछ नहीं हुआ, गरीब मूर्ख बनाए जाते रहे, वे चुनाव जीतती रहीं जब तक 1973 में (योम किपूर युद्ध) के बाद तेल का झटका नहीं लगा और अन्य बदलावों ने भारत की महंगाई दर को 1920 के दशकों की स्थिति में पहुंचा दिया और उनका फर्जी अर्थशास्त्र पूरी तरह उजागर हो गया। उसके बाद 40 वर्षों से भारत झुलसी धरती में प्राण फूंकने की कोशिश कर रहा है। उन्हें गलती का अहसास हुआ पर देर हो चुकी थी। 


राजनीतिक इतिहास बताता है कि लोकलुभावन रास्ते पर जाना कितना आसान, जोखिम से मुक्त और आर्थिक रूप से कितना फायदेमंद है और इसे उलटना कितना चुनौतीपूर्ण, जोखिमभरा और आमतौर पर अलोकप्रिय होता है। सबसे बहादुर सुधारक ही ऐसे पंगे लेते हैं। 1991 में नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने कुछ ऐसा किया और बाद में यशवंत सिन्हा व जसवंत सिंह के साथ अटल बिहारी वाजपेयी ने यह किया।


मोदी से इससे भी अधिक नाटकीय कदम की अपेक्षा थी। उन्हें विरासत में ऐसे बैंक मिले, जिन्हें इंदिरा ने करीब दिवालिया हालत में अधिग्रहित किया था। चार साल बाद वे उनमें ताजा पूंजी लगा रहे हैं, करदाताओं का पैसा वे भारत के सबसे धनी, सबसे बिगड़े हुए और भ्रष्ट लोगों के लोन पर बर्बाद करेंगे। भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के 21 बैंक अब भी देश की वित्तीय व्यवस्था के केंद्र में हैं। लेकिन, पूजनीय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सहित इन सब बैंकों की कुल बाजार पूंजी एचडीएफसी बैंक से (आज की तारीख में अच्छे-खासे 50,000 करोड़ से) कम है, जो 23 से कुछ ज्यादा वर्ष पहले अस्तित्व में आया था। ऐसा विनाश सरकारी स्वामित्व वाली बैंकों ने किया।


इंदिरा गांधी के प्रभाव वाले दिनों में जैसा होता था, इस बार भी कुछ नहीं होगा। फायदा होगा तो सिर्फ ज्वेलर मोदी, माल्या, भूतकाल व वर्तमान के सैकड़ों धनी ठगों को, जो अब अपना भुगतान न किया जा सकने वाला कर्ज बड़े डिस्काउंट पर बेच रहे हैं। इन्हीं में से कुछ डिफाल्टर अब उन कंपनियों को खरीदने के लिए भारी डिस्काउंट पर बोली लगा रहे हैं, जिन्हें उन्हीं ने दिवालिया किया है। प्रधानमंत्री के साथ डेवोस का ग्रुप फोटो देखें इनमें से कुछ उसमें भी दिख जाएंगे। 


भारतीय बैंकिंग समय-समय पर कर्ज के संकट से गुजरती है। आप इनमें से किसी भी मौके पर भारतीय डिफॉल्टरों की कलंक-सूची देखें तो आपको कुछ लोग बार-बार दिखाई देंगे। इसका केवल एक ही कारण है कि वे फिर से उन्हीं सरकारी बैंकों तक पहुंचने में कामयाब हो जाते हैं, उसी प्रकार के बढ़ा-चढ़ाकर बताए प्रोजेक्ट के प्रस्ताव लेकर और कर्ज चुकाने में नाकाम रहते हैं। वे जानते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था में कर्ज माफी योग्य होता है। इन सारी सूचियों में दूसरा आम तथ्य यह है कि उनके द्वारा लूटे गए सारे के सारे (एकाध अपवाद छोड़कर) बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के हैं। यहां तक कि माल्या से भी निजी बैंकों ने लगभग सारा पैसा वसूल कर लिया है। इंदिरा गांधी का इरादा चाहे जो रहा हो पर बैंकों के राष्ट्रीयकरण से गरीबों को फायदा नहीं हुआ लेकिन, कई फलते-फूलते कॉर्पोरेट घरानों के लिए शानदार रहा। यदि सरकारी बैंकों का बाजार पूंजीकरण निजी बैंकों से आधा भी होता तो भारत सरकार और करदाता कम से कम 10 लाख करोड़ रुपए से अमीर होते। ऐसे में यह कहना गरीबों के साथ अन्याय है कि राष्ट्रीयकृत बैंक गरीबों अथवा प्राथमिक क्षेत्रों को लोन देते हैं इसलिए उनकी हालत खराब है, क्योंकि वे ज्यादातर लोन लौटाते हैं और मध्यवर्ग तो हमेशा लौटाता है। गरीब खासतौर पर किसान न भी लौटाए तो सरकार बैंकों को लौटाती है, चुनाव की पूर्व संध्या पर वोट खरीदने के लिए। 


गांधी परिवार इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी आर्थिक गलती को ऐसा महत्व देता है कि किसी भी कांग्रेस सरकार के लिए बैंकों पर सरकारी नियंत्रण को शिथिल करने के बारे में सोचना भी मुश्किल है। समझ में नहीं आता कि मोदी भी उसी भावना से क्यों बंधे हैं। सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि मोदी नेहरू द्वारा किए हर काम को उलट देना चाहते हैं पर उनकी बेटी इंदिरा गांधी की सबसे गलत नीतियों को हाथ लगाने से भी झिझकते हैं। 1969 में इंदिरा गांधी ने यह कहकर बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया कि वे सिर्फ धनी लोगों को ऋण दे रहे हैं और गरीब उपेक्षित हैं। राष्ट्रीयकरण के 50वें वर्ष में उन्हीं बैंकों का इसलिए भट्‌टा बैठ रहा है कि उन्होंने बिना सवाल पूछे धनी वर्ग को जरूरत से ज्यादा पैसा दे दिया। इस नादानी को न सिर्फ जारी रखने बल्कि उसमें करदाता के 2.11 लाख करोड़ रुपए भी देने को आप क्या कहेंगे?


पीएनबी महाराष्ट्र के शुगर बेल्ट के किसी राजनीतिक ठग का कोई छोटा सहकारी बैंक नहीं है। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा बैंक है। दुनिया के कुछ सबसे धनी चोरों ने इसे इतने वर्षों में खाली कर दिया  इतने ऑडिट या सरकारी सदस्यों वाला बोर्ड भी इसे पकड़ नहीं पाया। यह बहुत बड़ी राष्ट्रीय शर्मिंदगी है। इसलिए मोदी को इनसे पिंड छुड़ा लेना चाहिए। आज की तारीख में यह लोकप्रिय कदम होगा। इसके लिए उन्हें गांधी-नेहरू घराने के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण सदस्य को दोष देने का संतोष भी मिलेगा। इस संकट का वे क्या इस्तेमाल करते हैं यह उन पर है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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