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भारतीय शहरों में परिवहन क्रांति लाने का यही वक्त

तीसरी व चतुर्थ श्रेणी के शहरों में लोक परिवहन के साधनों में सवारी को नीची निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए।

Sidharth sachdev | Last Modified - Jan 06, 2018, 05:56 AM IST

  • भारतीय शहरों में परिवहन क्रांति लाने का यही वक्त
    सिद्धार्थ सचदेव, 23 आईआईएम, रायपुर

    दशकों से कार महत्वाकांक्षी भारतीयों की प्रतीक रही है। याद करें 1990 का दशक । तब भारतीय मध्यवर्ग के लिए मारुति 800 का मालिक बनना आकांक्षाओं की कैसी पूर्ति हुआ करती थी। हर साल देशभर मंें सरकारें उपलब्ध किसी भी शहरी स्थान पर ताजा तारकोल चढ़ाया करती थी ताकि कार मालिकों की हरसतों भरी श्रेणी में आने वाले नवागुंतकों का स्वागत किया जा सके। इस दौरान कार न होने वाले लाखों लोग संकरे फुटपाथों पर धकेल दिए गए, जो किसी बस स्टाप की ओर जाते थे। उनकी भी हसरत रहती कि किसी दिन वे भी कार मालिक बन जाएंगे।


    हम किसी भी शहर में जाएं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अब हर किसी को कार चलाने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। अब वक्त आ गया है कि इस पहलू पर सरकार गंभीर कदम उठाए। सही है कि मेट्रो प्रोजेक्ट शुरुआत के लिए अच्छे हैं लेकिन, वे अपने आप में अंत नहीं है। इन योजनाबद्ध मेट्रो स्टेशनों को जोड़ने के लिए ठोस बस व्यवस्था होना आवश्यक है और वह उतनी ही सुरक्षित व भरोसेमंद हो।


    इस दशक में यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि शहरी परिवहन का मौजूदा मॉडल टिकाऊ नहीं है और बढ़ती आय के साथ सड़क पर बढ़ते वाहनों के इस चक्र से बाहर आने का एक ही तरीका है कारगर लोक-परिवहन का विकल्प। दिल्ली मेट्रो की मेजेंटा लाइन के उद्घाटन अवसर पर दिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण ध्यान देने योग्य है। लोक परिवहन के साधनों का इस्तेमाल गौरव का विषय होना चाहिए। तीसरी व चतुर्थ श्रेणी के शहरों में लोक परिवहन के साधनों में सवारी को नीची निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए।


    भारत एक बढ़ती अर्थव्यवस्था है और जनगणना का डेटा बताता है कि सिर्फ 31 फीसदी आबादी शहरी केंद्रों में रहती है। 2050 तक इसमें 30 करोड़ लोग और जुड़ जाएंगे और उन लोगों को परिवहन मुहैया कराने की योजना अभी से बननी चाहिए। यदि नीति निर्माता कल की समस्याओं के लिए आज योजना बनाए तो लोक-परिवहन को बहुत आसानी से सस्ता, तीव्र और किफायती विकल्प बनाया जा सकता है।

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