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खेल संघों की कार्यशैली बदली तो उम्मीद उजली

Sreeschand Mishra | Last Modified - Dec 30, 2017, 07:46 AM IST

जहां जीवटता की कसौटी खड़ी हुई, सब कुछ ढह गया
  • खेल संघों की कार्यशैली बदली तो उम्मीद उजली
    श्रीशचंद्र मिश्र पूर्व संपादक और वरिष्ठ खेल पत्रकार

    बैडमिंटन, क्रिकेट और कुछ हद तक हॉकी में इस साल मिली सफलता पर संतोष भले ही कर लिया जाए लेकिन, बीतता साल भविष्य के लिए कोई बड़ी उम्मीद जगाने में नाकाम रहा। पचास से ज्यादा पंजीकृत और सरकारी सहायता प्राप्त खेलों में से दो-तीन में मिलती रही सफलता एक खेल शक्ति बनने की हल्की सी उम्मीद जगाती है, लेकिन, वह आधार अभी तक नहीं बन पाया है, जो वैश्विक खेल पटल पर भारत की स्थायी पहचान बना सके। खेलों में भारतीय सफलता वैयक्तिक प्रयास या आर्थिक प्रोत्साहन के बल पर संभव हो पा रही है। कोई सांगठनिक तंत्र ऐसा नहीं बन पाया है जो निचले स्तर से खेलों की सुविधाओं में विस्तार दे।


    विभिन्न खेलों की प्रोफेशनल लीग ने कॉर्पोरेट से मिले पैसों के बल पर खिलाड़ियों को आर्थिक रूप से मजबूत किया है लेकिन, अर्थ सुविधा की यह बारिश कुछ एलीट खिलाड़ियों तक ही सिमट कर रह गई है। साइना नेहवाल ने बैडमिंटन में चीनी खौफ को खत्म कर जो रास्ता बनाया था, उसी पर इस साल पीवी सिंधू और किंदाबी श्रीकांत ने सचमुच ऐतिहासिक इबारत लिखी है। सिंधू साल में दो सुपर सीरिज टूर्नामेंट जीतने में सफल रहीं लेकिन, बड़ी प्रतियोगिताओं के फाइनल में लड़खड़ा जाने का सिलसिला तोड़े बिना वे नंबर एक नहीं हो पाएंगी। श्रीकांत इस साल मजबूती से उभरे और चार सुपर सीरिज खिताब उन्होंने जीते। लेकिन फिटनेस की समस्या उनके महान बनने में आड़े आ रही है।


    मीडिया और प्रायोजकों की शह पर फले-फूले क्रिकेट की औसत सफलताओं को कोई बड़ी उपलब्धि मानने का कोई मतलब नहीं है। पिछले साल मजबूत टीमों के मुकाबले स्थिति अपेक्षाकृत ज्यादा बेहतर थी। इस साल अपना हाथ ऊंचा रखने के लिए टीम को खासा जूझना पड़ा। जहां परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण रही- जैसे चैम्पियन्स ट्रॉफी के फाइनल में ें, क्रिकेटीय श्रेष्ठता की कलई खुल गई। नए साल में दक्षिण अफ्रीका से असली परीक्षा का जो दौर शुरू होगा वह इंग्लैंड व ऑस्ट्रेलिया तक के मुकाम क्या रंगत दिखा पाता है उसी से साबित होगी करोड़पति क्रिकेट टीम की महानता।


    हॉकी टीम ने 2014-15 के बाद एक बार फिर इस साल वर्ल्ड लीग के फाइनल में कांस्य पदक जीता। रियो ओलिम्पिक के रजत पदक विजेता बेल्जियम और कभी हॉकी में मजबूत ताकत रहे जर्मनी को हराया लेकिन, इस प्रदर्शन से स्वर्णिम दौर की शुरुआत का जरा-सा भी संकेत नहीं मिला। वजह कई हैं। टीम के खेल में एकरूपता की कमी एक पुरानी बीमारी बन चुकी है। एक मैच में चैम्पियन की तरह खेलने और अगले ही मैच में बिखर जाने का सिलसिला टीम बार-बार कोच बदलने के बाद भी नहीं तोड़ पाई है। आल्टमंस को 2020 के टोक्यो ओलिम्पिक तक टीम का ठेका देने के दस महीने बाद ही चलता कर दिया गया।


    चौंतीस साल की उम्र में पांचवी बार एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतना निश्चित रूप से मेरी कॉम की बड़ी सफलता रही। लेकिन यही बात उन्हीं की तरह वापसी की कोशिश में लगे सुशील कुमार के लिए नहीं कही जा सकती। वाक ओवर के सहारे राष्ट्रीय चैंपियन बने सुशील कुमार राष्ट्रमंडल प्रतियोगिता में भले ही स्वर्ण पदक जीत गए हों लेकिन, मुकाबले का स्तर देखते हुए ओलिम्पिक खेलों की बात तो दूर रही क्या उन्हें अगले साल के एशियाई व राष्ट्रमंडल खेलों में पदक का दावेदार माना जा सकता है? उस प्रतियोगिता में पहलवान 29 स्वर्ण, 24 रजत व छह कांस्य पदक बटोर लाए। यही पहलवान कुछ हफ्ते पहले ग्रीको रोमन कुश्ती की विश्व प्रतियोगिता से खाली हाथ लौट आए थे। कई तो अपना पहला मुकाबला तक नहीं जीत सके। फुटबॉल की तो बात करना फिजूल है। अंडर-17 विश्व प्रतियोगिता की मेजबानी मिली। भारतीय संदर्भ में नतीजा सिफर रहा। टीम अपने ग्रुप के तीनों लीग मैच हार गई। बाकी खेलों में सामान्य मुकाबले जहां जहां हुए, वहां पदक हाथ लग गए। जहां जीवटता की कसौटी खड़ी हुई, सब कुछ ढह गया।


    यह निराशाजनक स्थिति युवाओं में उत्साह की कमी की वजह से नहीं है। तिरुवनंतपुरम में चल रही राइफल व पिस्टल स्पर्धाओं की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 5200 निशानेबाजों का उतरना इसका प्रमाण है। ज्यादातर ने न्यूनतम क्वालिफाइंग स्तर छू कर प्रविष्टि पाई। खेल संघों की कार्यशैली का आलम यह है कि 1982 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले कौर सिंह को इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ा। उनकी दुर्दशा की खबर जानकर भी मुक्केबाजी संघ के पदाधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। नरिंदर बत्रा अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ के अध्यक्ष हैं। अब वे भारतीय ओलिम्पिक संघ के अध्यक्ष भी बन गए हैं। समझा जा सकता है कि ओलिम्पिक खेलों के लिए तैयारी का आलम कैसा होगा। रही सरकार की बात तो टारगेट ओलिम्पिक पोडियम स्कीम के तहत पौने दो सौ खिलाड़ियों को कुछ-कुछ लाख रुपए बांट देने तक ही उसकी भूमिका सीमित है। ऐसे में 2018 बीतते साल से बेहतर होगा क्या?

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Web Title: Sreeschand Mishra Talking About Sports Work Associations
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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