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वेतन भोगियों के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन की वापसी संभव

व्यक्तिगत करदाता को रिबेट देकर जीएसटी दरें घटाएं

Dainik Bhaskar

Jan 31, 2018, 05:51 AM IST
सीए भावना दोशी सीए भावना दोशी

आयकर छूट की सीमा को मौजूदा 2.50 लाख रुपए से बढ़ाकर 3 लाख रुपए करने की अपेक्षा सभी को है लेकिन, मुझे नहीं लगता कि सरकार इससे छेड़छाड़ करेगी, क्योंकि तब इससे कुछ लोग टैक्स नेट के दायरे से बाहर हो जाएंगे जबकि जरूरत तो कराधार बढ़ाने की है। इसके साथ ही करदाता के हाथों में खर्च करने योग्य आमदनी बढ़ानी होंगी ताकि मांग और निवेश बढ़ाए जा सके। इसे वेतनभोगी वर्ग के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन लाकर किया जा सकता है। आयकर की धारा 80 के तहत विशिष्ट निवेश पर कटौती भी बढ़ाई जा सकती है। कम लागत पर अतिरिक्त पूंजी की मांग वाले विशिष्ट क्षेत्रों में निवेश पर नई रियायतें लाई जा सकती है जैसे कृषि संबंधी क्षेत्र, इनोवेशन तथा स्टार्टअप, बुनियादी ढांचे के विशिष्ट प्रोजेक्ट आदि। शिक्षा, कौशल विकास और चिकित्सा उपचार में अतिरिक्त फायदे उपलब्ध कराए जा सकते हैं।


निवेशकों को कैपिटल गैन्स टैक्स में संभावित बदलाव की चिंता है। क्या सूचीबद्ध सिक्यूरिटीज के संदर्भ में दीर्घावधी कैपिटल गैन्स टैक्स पर कर लाभ वापस ले लिया जाएगा या उसमें कटौती होगी अथवा क्या होल्डिंग पीरियड को मौजूदा एक साल से बढ़ाकर दो साल कर दिया जाएगा? ऐसे कई सवाल निवेशकों के मन में है। मेरा मानना है कि शेयर बाजार में निवेशकों की पर्याप्त गहमागहमी बनाए रखने के लिए और शेयर बाजार को बढ़ावा देने के लिए सरकार दीर्घावधि कैपिटल गैन्स टैक्स व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं करेगी।


अपवाद यह हो सकता है कि लाभांश की तरह एक विशिष्ट राशि के आगे कैपिटल गैन्स पर भी टैक्स लगाया जाए। ये दोनों कदम यानी 10 लाख रुपए से ऊपर लाभांश पर कर (जो पहले से लागू है) और दीर्घावधि कैपिटल गैन्स टैक्स पर ऐसी व्यवस्था (यदि अब लागू हुई) का मतलब होगा ऊंची नेटवर्थ के लोगों के लिए ‘मैट।’ निश्चित ही यह एकाधिक स्तर पर करारोपण करना होगा लेकिन, इसे धनी से गरीब वर्ग की ओर अामदनी के हस्तांतरण (लाभ योजनाओं के माध्यम से) के रूप में भी देखा जा सकता है। यह संपन्न व वंचित तबकों में संपदा अथवा कर चुकाने के बाद आदमनी में अंतर कम करने का सामाजिक कदम होगा! बढ़ती आर्थिक विषमता को कम करने की चुनौती तो है ही।


मैं सरकार के विचारार्थ रिबेट की एक नई स्कीम रखना चाहती हूं। कर-दाता (व्यक्तियों) यात्रा, लॉन्ड्री, हैल्थ क्लब आदि पर डिजिटल या बैंकिंग सिस्टम (यानी नकद या बुक एडजस्टमेंट के जरिये) से किए खर्च पर सीजीएसटी के 20 फीसदी और आईजीएसटी के 10 फीसदी के बराबर स्पेशल रिबेट। इसकी लागत बिज़नेस के लिए इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं होगी। इससे लोगों को इन आइटमों पर चुकाए जीएसटी का इनवॉइस लेने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। व्यक्तियों के टैक्स रिटर्न में इस डेटा को अपलोड करने की अलग से सुविधा दी जा सकती है। इस तरह एकत्रित डेटा सप्लायर के यहां सत्यापित किया जा सकता है। इस कदम से अधिक लोग टैक्स व्यवस्था के दायरे में आएंगे और नकद लेने-देन से डिजिटल में आने के लिए प्रोत्साहित होंगे। इस 20 फीसदी रिबेट का कुल असर सीजीएसटी की दर 9 फीसदी से घटाकर 7.2 फीसदी, 6 फीसदी की दर 4.8 फीसदी और इसी तरह अन्य दरें घटाने में होगा। इसे दूसरी तरह से देखें तो व्यक्तियों के लिए यह प्रभावी आयकर दर घटाने जैसा होगा।


कॉर्पोरेट जगत के लिए टैक्स दर और इसी के साथ मैट दर घटाने का मामला बनता है। जीएसटी दरों में बदलाव तो जीएसटी काउंसिल के क्षेत्र का मामला है लेकिन, केंद्रीय कानूनों, सीजीएसटी और अाईजीएसटी मंे संशोधन जीएसटी काउंसिल की सिफारिशों पर संसद को पारित करने होंगे। कई धूसर क्षेत्र फाइनेंस बिल के मार्फत संशोधन हेतु लिए जाने की अपेक्षा है। अर्थव्यवस्था में बदलाव और जीएसटी के प्रभाव के बाद कस्टम ड्यूटी व्यवस्था को भी नया रूप देने की जरूरत है।


संक्षेप में, जहां तक प्रभावी आयकर दर की बात है 10 लाख से नीचे आय वाले व्यक्तिगत करदाताओं को कुछ राहत मिल सकती है। इसके साथ हाई नेट वर्थ वाले व्यक्तियों पर ऊंचे कर का बोझ डाला जा सकता है। अप्रत्यक्ष कर के मोर्चे पर कस्टम ड्यूटी रेट में कुछ एडजस्टमेंट के अलावा ज्यादा कुछ अपेक्षित नहीं है। कॉर्पोरेट क्षेत्र को टैक्स दरों में कुछ राहत मिल सकती है। और सरकार की अपेक्षा होगी कि टैक्स आधार बढ़ाकर और कर प्रावधानों के अमल पर बेहतर निगरानी के जरिये अधिक आमदनी एकत्रित की जाए। बजट पर चुनावी वर्ष के प्रभाव की बहुत चर्चा है, लेकिन आर्थिक चुनौतियों के चलते इसकी गुंजाइश कितनी हैं, यह देखना होगा।

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