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हमारी शैक्षणिक व्यवस्था बचपन तो नहीं छीन रही?

यह सोचने की जरूरत है कि हमारी शैक्षणिक-सामाजिक व्यवस्था बचपन तो नहीं छिन रही?

Danik Bhaskar | Feb 20, 2018, 05:26 AM IST
सुधीर कुमार, 23 एनए इतिहास बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस सुधीर कुमार, 23 एनए इतिहास बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस

हरियाणा में छात्र द्वारा अपनी प्राचार्या की गोली मारकर हत्या, लखनऊ में छात्रा का एक छात्र पर जानलेवा हमला और पूर्व में गुरुग्राम में छात्र द्वारा दूसरे छात्र की हत्या करने की घटना में प्रमुख समानता यह है कि इन घटनाओं को अंजाम देने के पीछे कोई ठोस वजह नहीं रही। पढ़ाई तथा परीक्षा की बात करने या सामान्य डांट की वजह से बच्चों ने हिंसक रुप अख्तियार कर अपराध का दामन थाम लिया! यह सोचने की जरूरत है कि हमारी शैक्षणिक-सामाजिक व्यवस्था बचपन तो नहीं छिन रही?


राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक देशभर में 17 लाख से भी अधिक किशोर विभिन्न आपराधिक मामलों में आरोपी हैं। अभिभावकों द्वारा मार्गदर्शन में कमी, कुंठित मानसिकता, त्वरित प्रतिक्रिया देने की बेचैनी और सामाजिक भटकाव की वजह से बड़ी संख्या में किशोर अपराधों को अंजाम दे रहा है। उम्र के जिस पड़ाव पर अपने भावी सपनों में पंख लगाने की जरूरत होती है, तब कुछ किशोर जाने-अनजाने अपना भविष्य अंधकारमय करने पर तुले नजर आते हैं! हालांकि,किशोरों के मानसिक भटकाव के लिए हमारा सामाजिक माहौल भी बराबर का दोषी है। दिनोंदिन बदलते सामाजिक परिवेश और संयुक्त परिवार के विखंडन के कारण बच्चे परंपरागत पालन-पोषण से दूर हो गए हैं। समुचित निगरानी के अभाव में बच्चों को मोबाइल, टेलीविजन और इंटरनेट की लगी लत उनमें भोगवाद, तनाव, ईर्ष्या और अवसाद की प्रवृतियों को जन्म दे रही हैं। बच्चों का शारीरिक रुप से विकास तो हो रहा है, लेकिन, उन्हें आवश्यक संस्कार,मूल्य,नैतिकता तथा मानवता का ज्ञान नहीं मिल रहा है।


स्कूल और ट्यूशन के व्यस्त शेड्यूल,शारीरिक खेलों के प्रति अरुचि और कॅरियर के अनावश्यक दवाब ने उन्हें संतुलित जीवनशैली से दूर कर दिया है। बच्चों की परवरिश पर विशेष ध्यान देने और उन्हें सकारात्मक व रचनात्मक बनाने में अभिभावकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। वे बच्चों की समुचित निगरानी कर,नैतिकता का पाठ पढ़ाकर तथा संयमी बनने की सीख देकर बचपन को सहेजने के साथ, उनमें जिम्मेदार नागरिक के गुणों का विकास कर सकते हैं।