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गुजरात में शपथ के बहाने भाजपा का शक्ति समारोह

सीटों की कमी की मनोवैज्ञानिक भरपाई करने की कोशिश की है तो दूसरी तरफ अपने चक्रवर्ती होने का संदेश भी दिया है।

Danik Bhaskar | Dec 27, 2017, 01:45 AM IST

गुजरात में मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के शपथ ग्रहण समारोह को महाआयोजन बनाकर भाजपा ने एक तरफ सीटों की कमी की मनोवैज्ञानिक भरपाई करने की कोशिश की है तो दूसरी तरफ अपने चक्रवर्ती होने का संदेश भी दिया है। यह आयोजन उन राज्यों में भी माहौल बनाने का प्रयास है जहां अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत मंत्रिमंडल के कई सदस्यों और नीतीश कुमार सहित भाजपा व सहयोगी दलों व्दारा शासित 18 राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भव्य प्रदर्शन भाजपा के छठी बार सत्ता में आने का उत्सव तो था ही एनडीए की राजनीतिक शक्ति के समक्ष बिखरे विपक्ष को शक्तिहीन बताने का प्रयास भी था।

यह महज संयोग नहीं है कि इस शपथ ग्रहण समारोह को ज्यादातर मीडिया आगामी आम चुनाव का आगाज कह कर प्रचारित कर रहा था। शक्ति का यह प्रदर्शन जनता में विश्वास जगाता है और साथ ही अर्थव्यवस्था के भीतर भी अच्छी भावनाएं उत्पन्न करता है। यही कारण है कि मंगलवार को पहली बार सेंसेक्स 34,000 की ऊंचाई पर पहुंचा और निफ्टी ने भी 10,400 के ऊपर तक छलांग लगाई। इससे उस कमी की भी भरपाई होने की उम्मीद जगती है जो नोटबंदी और जीएसटी के झटके से पैदा हुई थी। इसके बावजूद हर समय शोभा यात्रा निकालना और अगले चुनाव की तैयारी में ही लगे रहने से किसी भी सरकार की वे प्राथमिकताएं कमजोर होती हैं, जिनके कारण जनता उसे चुनती है। भाजपा और उसके नेता अगर विचार करेंगे तो पाएंगे कि 22 साल से उनके शासन में चल रहे गुजरात मॉडल में बहुत सारी कमियां हैं।

जातिगत विभाजन कायम है और गांव तथा शहर के विकास में गहरी असमानता है। अगर शहर राष्ट्रवाद से अभिभूत हैं तो गांवों के लिए रोजी-रोटी समस्या बड़ी है। हालांकि भाजपा ने पटेलों की नाराजगी दूर करने के लिए उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल समेत छह पाटीदार मंत्री बनाए हैं लेकिन, इससे पूरी बिरादरी का असंतोष दूर होना असंभव है। मजबूती से उभरा विपक्ष और नए सदस्य जिन्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकुर जैसे युवाओं का विरोध भी रूपाणी सरकार के लिए चुनौती है। रूपाणी को बंगाल में वाममोर्चा के 34 साल के गिनीज बुक के रिकॉर्ड में दर्ज शासन को याद करते हुए समझना होगा कि लंबे समय तक शासन करना ही लोकतंत्र और विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने की गारंटी नहीं होती।