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संवैधानिक संस्थाओं के तथ्य व अनुमान में किसका महत्व?

इस फैसले ने कांग्रेस को कटघरे से बाहर निकालकर लड़ने के लिए खुले मैदान में खड़ा कर दिया है।

Dainik Bhaskar

Dec 22, 2017, 05:07 AM IST
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सीबीआई की विशेष अदालत ने टू जी महाघोटाले के सभी आरोपियों को बरी करके तमिलनाडु से दिल्ली तक, सुनवाई अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, कांग्रेस से भाजपा और मीडिया से अकादमिक जगत तक भ्रष्टाचार की तमाम बहसों को फिर खुला छोड़ दिया है।

यही कारण है कि फैसला आने के साथ ही कांग्रेस पार्टी संसद से सड़क तक आक्रामक हो गई और भाजपा सुप्रीम कोर्ट व सीएजी के हवाले से बचाव के अस्त्र शस्त्र गढ़ने में लग गई है। कांग्रेस को यह कहने का पूरा हक है कि जो घोटाला हुआ ही नहीं उसके कारण उसे हारना पड़ा, जबकि भाजपा की यह दलील भी बेकार नहीं है कि इस घोटाले की रिपोर्ट तो संवैधानिक संस्था नियंत्रक और लेखामहापरीक्षक(सीएजी) ने दी थी और उस पर प्राथमिक संज्ञान सुप्रीम कोर्ट ने लेते हुए यूपीए सरकार को जांच का आदेश दिया था। तीसरा पक्ष तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टी द्रमुक का है, जिसके नेता एमके स्टाालिन ने पूरे मामले को अपनी पार्टी को खत्म करने की साजिश बताते हुए भाजपा और मीडिया से ज्यादा कांग्रेस की ओर उंगली उठाई है।

सवाल उठता है कि संवैधानिक संस्थाओं के अनुमान और तथ्य में किसे महत्व दिया जाए। अगर 2008 में दूसरी पीढ़ी के टेलीस्पेक्ट्रम का आवंटन 2001 की दरों पर किया गया और कई अयोग्य कंपनियों को कम दरों पर सुविधा प्रदान की गई तो यह एक तथ्य है और इसे कानून की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। इन्हीं पहलुओं का ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 122 कंपनियों के लाइसेंस रद्‌द कर बृहत्तर जांच के आदेश दिए। सीएजी की दूसरी बात जो राजनीतिक विमर्श और जनमत के निर्माण और कांग्रेस के पराभव का बड़ा आधार बनी वो थी घोटाले के आकार की। सीएजी ने अपनी गणना के आधार पर कह दिया कि अगर नई दरों के आधार पर स्पेक्ट्रम की खुली नीलामी हुई होती तो सरकार को 1.76 लाख करोड़ की कमाई होती। हालांकि बाद में थ्री जी के स्पेक्ट्रम की नीलामी बहुत फीकी रही। फिर भी सीएजी की कमान से निकले हुए इस तीर ने यूपीए सरकार को ध्वस्त करते हुए कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को ही दागदार नहीं किया साफ सुथरी छवि के अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी संदेह के घेरे में ले लिया। अभी भ्रष्टाचार की बहस खत्म नहीं हुई है लेकिन, इस फैसले ने कांग्रेस को कटघरे से बाहर निकालकर लड़ने के लिए खुले मैदान में खड़ा कर दिया है।

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