संपादकीय

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सोच बदलकर किसानों के लिए ठोस कार्यक्रम बनाएं

यही वजह थी कि चौहान ने भोपाल के जम्बूरी मैदान में जो किसान महासम्मेलन किया उसमें सबसे कम उपस्थिति किसानों की ही थी।

Danik Bhaskar

Feb 14, 2018, 07:53 AM IST

चुनाव लोकतंत्र को जवाबदेह और संवेदनशील बनाता है। यह बात कम से कम मध्यप्रदेश और राजस्थान की सरकारों के रुख से साबित हो रही है। उपचुनाव हार चुकी राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने किसानों के पचास हजार रुपए तक के कर्ज माफी की घोषणा की है। उनका ध्यान छोटे और मझोले किसानों पर है और कर्जमाफी के इस कदम से 20 लाख किसानों को लाभ मिलने का दावा किया गया है। वसुंधरा राजे सरकार ने किसानों की मालगुजारी माफ करने के लिए एक आयोग बनाने का फैसला किया है, जिससे चालीस लाख किसानों को राहत मिल सकती है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों के कर्ज का ब्याज माफ करने का एलान किया है।

इसके अलावा सरकार ने पिछले साल रबी की प्रति क्विंटल खरीद पर 200 रुपए के बोनस का एलान किया है। उनका एलान है कि आने वाले मौसम में रबी के किसानों को बोनस के साथ 2000 रुपए प्रति क्विंटल की प्राप्ति होगी। इसी साल चुनाव में उतर रहे इन सरकारों ने यह कदम मजबूर होकर उठाया है। राजस्थान में तो बारी-बारी से सरकारें बदलती हैं लेकिन, मध्यप्रदेश में तीन बार से काबिज शिवराज सरकार की तमाम कमियां सामने आ चुकी हैं। पिछले साल मंदसौर, इंदौर, उज्जैन, रतलाम से लेकर भोपाल तक मध्यप्रदेश के किसानों ने जो हिंसक आंदोलन किया उसके जवाब में स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी अनशन करना पड़ा। उससे सरकार का ध्यान तो किसानों की समस्याओं की ओर गया लेकिन, उसे दूर करने के लिए सरकार ने जो कदम उठाए वे भरोसे पर खरे नहीं उतरे।

यही वजह थी कि चौहान ने भोपाल के जम्बूरी मैदान में जो किसान महासम्मेलन किया उसमें सबसे कम उपस्थिति किसानों की ही थी। चौहान सरकार व्यापारियों के दबाव और नोटबंदी के कारण किसानों की फसलों के दाम दिला नहीं सकी है। किसानों की दशा के बारे में जो रिपोर्टें हैं वे डराने वाली हैं। स्टेट ऑफ इंडियाज एनवारनमेंट 2017 के अनुसार देश में 34 किसान रोजाना आत्महत्या कर रहे हैं। 2014 से 2015 के बीच किसान आत्महत्या के मामलों में 42 प्रतिशत वृद्धि हुई है। देश के 31.4 प्रतिशत कृषक परिवारों पर कर्ज है जबकि 22.4 प्रतिशत कर्ज गैर कृषक परिवारों पर है। इसलिए किसानों के बारे में बुनियादी सोच बदलनी होगी और चुनाव के अल्पकालिक हितों से ऊपर उठकर दीर्घकालिक ठोस कार्यक्रम बनाने होंगे।

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