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सुधारों का लाभ तो है तेल की कीमत का जोखिम भी

कृषि पर जोर देने से ग्रामीण आम आदमी फायदे में रहेगा

अभीक बरुआ, तन्वी गर्ग | Last Modified - Jan 30, 2018, 06:30 AM IST

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    अभीक बरुआ चीफ इकोनॉमिस्ट, एचडीएफसी बैंक

    कई संभावनाअों की वजह से यह बजट अत्यधिक महत्वपूर्ण है। एक, यह नोटबंदी (प्रत्यक्ष कर में उछाल के माध्यम से) और जीएसटी के कारण अप्रत्यक्ष कर में आए उछाल का पूरा लाभ लेने वाला पहला बजट होगा। दो, आठ राज्यों में चुनाव होने हैं और इसका स्पष्ट प्रभाव बजट पर दिखेगा। तीन, 2019 के आम चुनाव के पहले यह अंतिम पूर्ण बजट होगा।

    इससे लगता है कि राजनीतिक मजबूरियां बजट की प्राथमिकताओं पर हावी रहेंगी। लेकिन, पिछले तीन लोकसभा चुनाव का विश्लेषण निर्णायक रूप से यह तथ्य स्थापित नहीं करता। 2004 के चुनाव के पहले राजस्व खर्च की तुलना में पूंजीगत खर्च में उछाल आया था पर 2009 में खर्च की गुणवत्ता घटती गई और 2014 के चुनाव में भी इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिलता है।


    बजट की चुनौतीपूर्ण वहद आर्थिक पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखना होगा। घरेलू अर्थव्यवस्था भी शायद अब पहले की तरह गोल्डीलॉक परिदृश्य में नहीं है और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख जोखिम के रूप में उभरी हैं। ग्रामीण संकट तीव्र होता प्रतीत होता है और सरकार के सामने इसे व्यापक रूप से निपटने की चुनौती मौजूद होगी। ग्रामीण क्षेत्र को ध्यान में रखकर घोषित योजनाओं व आवंटनों को ‘लोकलुभावन’ वोट खींचने की कवायद माना जाएगा अथवा असली समस्या के प्रति योग्य प्रतिसाद के रूप में देखा जाएगा यह संबंधित विश्लेषक के झुकाव व रुझान की बात है।


    ये अनिवार्यताएं और पिछले बजटों में सरकार ने वित्तीय अनुशासन के प्रति जो संकल्प दिखाया है उससे उम्मीद है कि वर्ष 2018 के लिए वित्तीय घाटा जीडीपी के 3.2 फीसदी के बराबर होगा और अगले साल का लक्ष्य वित्तीय मजबूती के रास्ते पर ही आगे बढ़ते हुए 3 फीसदी होगा। नि:संदेह सरकार ने पूर्व में लगाए अनुमान के मुताबिक अतिरिक्त उधारी को 50,000 करोड़ से घटाकर 20,000 करोड़ रुपए तक कायम रखा, जो वित्तीय अनुशासन के प्रति हमारे भरोसे को आवश्यक राहत देता है। जहां तक विशिष्ठ बजट अपेक्षाओं का सवाल है, यह समझना और रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि बजट कुछ सीमित दायरे में ही प्रभाव डाल सकता है और अर्थव्यवस्था से जुड़ा सबकुछ बजट के दायरे में नहीं आता है। उदाहरण के लिए एपीएमसी यानी कृषि उपज बाजार समिति अधिनियम में संशोधन का मामला विशुद्ध रूप से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसी तरह जीएसटी से संबंधित फैसले जीएसटी काउंसिल के विशेषाधिकार में आते हैं और एमएसपी (फसलों का अधिकतम समर्थन मूल्य) तय करने जैसे वित्तीय फैसले वास्तव में बजट की कवायद तक सीमित नहीं हैं।


    यह कहने के बावजूद इस बजट से हमारी कुछ विशिष्ठ अपेक्षाएं भी हैं। पहली अपेक्षा यह है कि गांव का आम आदमी सबसे अधिक फायदे में रहेगा, क्योंकि सरकार ग्रामीण संकट से संबंधित मुद्‌दों को तवज्जो देगी। यह खासतौर पर खेती से होने वाली आय को 2022 तक दोगुना करने और किफायती आवास के लिए दिया जाने वाला अधिक आवंटन हो सकता है। खेती और गांव के आर्थिक संकट से निपटने का यह कारगर तरीका हो सकता है। जहां तक शहरी ‘आम आदमी’ का सवाल है सबसे बड़ा जोखिम सूचीबद्ध इक्विटी पर दीर्घावधि कैपिटल गैन टैक्स की बहाली का है। जहां तक टैक्सेशन का सवाल है वैश्विक ट्रेंड के मुताबिक कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती देखने की बात होगी। इंडस्ट्री को इसी की उम्मीद है।


    वित्तीय गणित में जाएं तो इस साल हताशा के बाद हमें गैर-टैक्स आमदनी में वापसी की उम्मीद है। संभावना यह भी है कि इस वर्ष की तुलना में 2019 के वित्तीय वर्ष में सरकार ऊंचे टैक्स जीडीपी अनुपात की ओर जा सकती है। हालांकि, संभावना यही है कि विनिवेश ही मौजूदा वर्ष और अगले वर्ष में भारी बोझ उठाएगा। यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि 36 सार्वजनिक उपक्रमों (जिनकी पहले ही पहचान कर ली गई है) में रणनीतिक विनिवेश की योजनाएं कैसे धरातल पर आती हैं। बॉन्ड मार्केट के हिसाब से वित्तीय अनुशासन पर बरकरार रहना अनिवार्य है ताकि बॉन्ड का ऊंचा प्रतिफल और ब्याज दरों को मौजूदा आर्थिक वापसी पर लगाम लगाने से रोका जा सके। कुल-मिलाकर वित्त मंत्री को कई चीजों में संतुलन साधने की नाजुक कवायद करनी है।

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