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हज सब्सिडी के धन का उपयोग शिक्षा की बेहतरी के लिए हो

सरकार की तरफ से रियायत देने का कोई औचित्य नहीं है।

Danik Bhaskar | Jan 18, 2018, 04:49 AM IST

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की निर्धारित मियाद से चार साल पहले ही हज यात्रा की सब्सिडी वापस लेकर अपने सख्त होने के साथ तुष्टीकरण विरोधी होने का संदेश दे दिया है। संयोग से यह कदम तब उठाया गया है जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत दौरे पर हैं और कर्नाटक के बाद राजस्थान, तमिलनाडु जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव आसन्न हैं। हज की सबसिडी खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में निर्णय दिया था कि इसे धीरे-धीरे 2022 तक खत्म कर दिया जाए, क्योंकि हज यात्रा एक निजी धार्मिक यात्रा है और उसमें सरकार की तरफ से रियायत देने का कोई औचित्य नहीं है।

वैसे भी सब्सिडी का ज्यादा फायदा एयरलाइन्स को हो रहा था। यही कारण है कि ज्यादातर विपक्षी दलों ने सरकार के इस फैसले पर कोई विरोध नहीं जताया है। विपक्षी दलों की यह मांग जरूर है कि अब सरकार इस धन का इस्तेमाल अल्पसंख्यक समाज की शिक्षा के लिए करे। सरकार ने भी सब्सिडी खत्म करने की घोषणा के वक्त यही कहा है। आजम खान जैसे नेताओं ने जरूर इस बहाने यह सवाल उठाया है कि अमरनाथ और मानसरोवर जैसी हिंदुओं की धार्मिक यात्राओं पर दी जाने वाली सब्सिडी भी वापस होनी चाहिए। इससे यही लगता है कि आगे यह ये मुद्‌दे राजनीतिक तौर पर जरूर उठेंगे और इस पर भी अल्पसंख्यक समाज की राजनीति केंद्रित होगी।

इस बीच सरकार ने सऊदी अरब सरकार से मिलकर 1954 में समुद्री हादसे के कारण बंद हुई पानी के जहाज की हज यात्रा फिर से शुरू करने की तैयारी कर ली है और अब इसमें पहले के 15-20 दिन की बजाय एक तरफ से दो से तीन दिन ही लगेंगे। सरकार ने महिला हज यात्रियों को पुरुष यात्रियों के साथ जाने की पाबंदी समाप्त कर दी है और 45 साल से ऊपर की महिला को तीन-चार के समूह में जाने की छूट देकर प्रगतिशील कदम उठाने का दावा किया है। आने वाले समय में तीन तलाक, हज सब्सिडी और मेरहम का नियम समाप्त करने के कदम को जरूर यह सरकार अपने सेक्यूलर कदम के रूप में पेश करेगी। अब देखना है कि वह इन उपायों के साथ साथ मुस्लिम समाज में तरक्की के लिए न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर और रंगनाथ मिश्रा समिति की तरफ से सुझाई गई सिफारिशों को किस हद तक लागू करती है।