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विश्व बैंक ने जगाई भारत के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद

चीन की अर्थव्यवस्था का आकार हमसे बड़ा है और वहां वित्त वर्ष दिसंबर में समाप्त होता है जबकि भारत में 31 मार्च तक चलता है।

Dainik Bhaskar

Jan 11, 2018, 07:30 AM IST
talking about world bank and india

केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के अनुमान के पांच दिन बाद ही उससे असहमति जताते हुए विश्व बैंक ने वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत को चीन से भी तीव्र बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बताकर देश के भीतर आशा का संचार किया है। जीडीपी की जिस वृद्धि दर को विश्व बैंक ने जीएसटी के कारण 7 प्रतिशत की बजाय 6.7 प्रतिशत तक रखा था, उसे उसने खुद ही संशोधित करके 7.3 प्रतिशत तक स्वीकार कर लिया है और कहा है कि चीन की वृद्धि दर 2017 के 6.8 प्रतिशत से गिरकर 6.4 प्रतिशत तक आ जाएगी। इन आंकडों से एक बात तो साबित होती है कि दुनिया में तीव्र विकास करने की होड़ में चीन और भारत अग्रणी हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन की अर्थव्यवस्था का आकार हमसे बड़ा है और वहां वित्त वर्ष दिसंबर में समाप्त होता है जबकि भारत में 31 मार्च तक चलता है।

भारत के केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने भी शुक्रवार को अर्थव्यवस्था में बहाली के रुझान का संकेत दिया था लेकिन, उसका कहना था कि 30 सितंबर तक वृद्धि दर 6 प्रतिशत तक रही और उसके बाद 7 प्रतिशत तक आएगी, जिसके औसतन 6.5 प्रतिशत होने का अनुमान है। विश्व बैंक का कहना है कि 2017-18 के वित्त वर्ष में भारत की विकास दर का औसत 7 प्रतिशत तक रह सकता है, जबकि अगले दो सालों में वह 7.5 प्रतिशत तक जा सकता है। विमुद्रीकरण और जीएसटी दोनों के प्रभाव पड़े हैं लेकिन विश्व बैंक का अनुमान है कि आखिरी तिमाही में करों की वसूली में इजाफा होगा और उसका फायदा अर्थव्यवस्था को होगा।

सरकार के जिन उपायों को इस आशावादी तस्वीर का श्रेय दिया जा रहा है उनमें अर्थव्यवस्था में स्थायित्व, बट्टा खाते के कर्ज(एनपीए) के खिलाफ कदम और श्रम सुधार जैसे तीन प्रमुख सूत्र हैं। बट्टा खाते के कर्ज से निपटने के लिए सरकार जो बॉन्ड जारी करने जा रही है उससे वित्तीय घाटा बढ़ सकता है और सरकार की 3 प्रतिशत की प्रतिज्ञा टूट कर 3.39 तक जा सकती है। उधर, श्रम सुधारों के विरुद्ध मजदूर संगठनों का दबाव है और इस मामले में वाम और दक्षिणपंथी दोनों ट्रेड यूनियन एकजुट हैं। उधर वृद्धि दर के बढ़े आंकड़ों पर भाजपा सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी से लेकर राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के पूर्व चेयरमैन प्रणव सेन तक संदेह जताते हैं। जनता को इनके सही होने और अच्छे प्रभाव पड़ने का इंतजार है।

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