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ताकत बढ़ाकर पश्चिम को गलत साबित किया शी ने

चीनी राष्ट्रपति कहते हैं, उनका मुकाबला अमेरिकी अर्थव्यवस्था से ही नहीं, बल्कि उनके बौद्धिक कौशल से भी है।

The Economist | Last Modified - Mar 09, 2018, 08:13 AM IST

ताकत बढ़ाकर पश्चिम को गलत साबित किया शी ने

पिछले सप्ताह चीन ने दुनिया को दिखा दिया कि वह तानाशाही की तरफ बढ़ रहा है। पश्चिमी देशों को राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बारे में अनुमान था कि वे बड़ा बदलाव करेंगे, जिसमें चीन को लोकतंत्र की तरफ मोड़ने की अटकलें भी थीं। इसकी बजाय उन्होंने खुद को इतना ताकतवर बना लिया कि वे जब तक चाहेंगे, चीन के राष्ट्रपति बने रहेंगे। उनके पहले माओ जेदोन्ग के पास इतनी शक्तियां थी। यह चीन के लिए बड़ा बदलाव नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों के लिए इस बात का बड़ा सबूत है कि चीन को लेकर 25 वर्षों की शर्त वे हार गए।


सोवियत संघ के विघटन के बाद पश्चिमी देशों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में उतरने के लिए चीन का स्वागत किया। वे मानकर चल रहे थे कि विश्व व्यापार संगठन जैसे वैश्विक संगठनों में भागीदारी से चीन नियम आधारित व्यवस्था में रम जाएगा। उन्हें उम्मीद थी कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में शामिल होने से चीन ‘मार्केट इकोनॉमी’ के लिए प्रोत्साहित होगा। उसके लोग लोकतांत्रिक स्वतंत्रता हासिल करने की इच्छा जताएंगे। परन्तु पश्चिम की यह परिकल्पना धूमिल हो गई।


चीन ने पिछले दशक में उम्मीद से कहीं ज्यादा रईस तैयार किए। आज शी जिनपिंग बलपूर्वक न केवल राजनीति कर रहे हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था भी उसी तरह चला रहे हैं। हर राज्य की व्यवस्था पर उन्हीं का नियंत्रण है। शी ने अपने अधिकारों का उपयोग कम्युनिस्ट पार्टी को मजबूत बनाने और उसमें अपनी जगह पहले से ज्यादा मजबूत करने में किया। भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान के दौरान उन्होंने अपने विरोधियों को कुचलना शुरू किया। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को पुनर्संगठित किया और उसे खुद के प्रति ज्यादा निष्ठावान बनाया। शी ने इसी दौरान स्वतंत्र विचारधारा रखने वाले वकीलों, कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया और मीडिया एवं ऑनलाइन आलोचना करने वालों का मुंह बंद करना शुरू किया। चीनी नागरिकों का जीवन सरकारी हस्तक्षेप से तो मुक्त है, लेकिन शी ने निगरानी सिस्टम तैयार किया है, उससे पता चलता है कि कहां ‘असंतोष और विचलन’ बढ़ रहा है।


चीन ने इस तरफ बिल्कुल दिमाग नहीं लगाया कि दूसरे देश खुद कैसे काम करते हैं। इसकी बजाय उसने ऐसा सिस्टम बनाया, जिसे खुलेपन एवं लोकतंत्र विरोधी समझा गया। कुछ दिन पहले कम्युनिस्ट पार्टी के 19वें सम्मेलन में शी ने दुनिया के सामने प्रस्ताव रखा। उसमें चीनी बुद्धि, कौशल और काम करने का तरीका उन समस्याओं के समाधान में लगाने की बात कही गई, जो मानवजाति महसूस कर रही है। इसके बाद शी ने कहा- चीनी नागरिकों को यह समझना होगा कि अमेरिका न केवल आर्थिक, बल्कि वैचारिक प्रतिस्पर्धी भी है। वैश्विक बाजार में अपनी अलग पहचान बनाने का उसका मॉडल बहुत सफल रहा। आज दुनिया की 100 सबसे मूल्यवान कंपनियों में से 12 वहां है। उसने अभूतपूर्व समृद्धि खुद के लिए भी निर्मित की और उनके लिए भी जिन्होंने उसके साथ काम किया।


चीन के पास ‘मेड इन चाइना 2025’ प्लान है, जिसमें वह 40 फीसदी मैन्युफैक्चरिंग का नियंत्रण खुद हासिल कर लेगा। औद्योगिक जासूसी को लेकर चीन की क्षमता अभी कम है, लेकिन पश्चिमी कंपनियां शिकायत करने लगी हैं कि उनकी ‘इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी’ हथियाने की कोशिशें की जाने लगी हैं। चीन पश्चिम के नियमों को मानता है, लेकिन अपने लिए वैसा ही अलग नियम तैयार कर लेता है। उसने ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना शुरू की, इसमें वह 66 लाख करोड़ रुपए दूसरे देशों में खर्च करेगा, जो उसके मार्शल प्लान का हिस्सा है। इस परियोजना का मतलब साफ है कि दूसरे देशों को चीन द्वारा तय समाधान मानने होंगे। व्यापार के नाम पर ही सही, लेकिन आज चीन ने व्यापार को विरोधियों के खिलाफ हथियार बना लिया है। हाल ही में उसने जर्मन कार निर्माता कंपनी को इसलिए झटका दिया क्योंकि उसने तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा के शब्दों का इस्तेमाल किया था। उसने फिलिपींस से फलों का आयात बंद कर दिया, क्योंकि उसने दक्षिण चीन सागर की एक जगह पर दावा किया था।


चीनी की नीति कारोबार में ‘शार्प पावर’ की और सैन्य मामलों में ‘हार्ड पावर’ अपनाने की है। वह पूर्वी एशिया में खुद को सबसे शक्तिशाली दिखाना चाहता है ताकि अमेरिका को यहां से दूर रख सके। इससे अमेरिका के प्रयासों को झटका लग सकता है, क्योंकि वह इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखना चाहता है। हालांकि, चीन की सेना आज भी अमेरिका से मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है, लेकिन चीन जिस तरह से बड़ी चुनौती के तौर पर उभर रहा है, उससे अमेरिका के लिए उसे रोक पाना मुश्किल हो जाएगा।


चीन के शार्प पावर का मुकाबला करने के लिए पश्चिमी समाज को चाहिए कि वे स्वतंत्र समूहों, संस्थानों यहां तक कि छात्र समूहों और चीन के बीच नई लिंक जोड़े। चीन अपनी आर्थिक ताकत का दुरुपयोग न कर पाए, इसलिए लिए जरूरी है कि चीनी सरकारी कंपनियों द्वारा किए जाने वाले निवेश और उसके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली संवेदनशील प्रौद्योगिकी की निगरानी की जाए। शी जिनपिंग में सत्ता और ताकत की जो भूख बढ़ रही है, उससे अस्थिरता का खतरा भी है। हो सकता है कि वे एक दिन ताइवान को चीन में मिलाने के प्रयास करें।
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Web Title: taakt bढ़aakar pshchim ko galat saabit kiyaa shi ne
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