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हमारे विकास की विडंबना दर्शातीं अनचाही बेटियां

बेटियों तक ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाओं की पहुंच भी नहीं हो पाती।

Dainik Bhaskar

Jan 31, 2018, 05:53 AM IST
This figure presents serious questions to the government and society

दुनिया में सबसे तीव्र विकास दर का दावा करने वाले आर्थिक सर्वेक्षण में प्रकट हुईं 2.10 करोड़ अनचाही बेटियां देश और समाज की संवेदना को झकझोर देने वाली हैं। वे हमारे विकास की विडंबना की कथा कहती हैं। बेटे की चाहत में ही अनचाही बेटियां इस संसार में आती हैं और उनके लिए न तो परिवार के स्तर पर संसाधन उपलब्ध रहते हैं और न ही देश व समाज के स्तर पर। उन बेटियों तक ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाओं की पहुंच भी नहीं हो पाती। पश्चिमोत्तर विश्वविद्यालय की अर्थशास्त्री सीमा जयचंद्रन के शोध में पहली बार प्रकट हुआ यह आंकड़ा सरकार और समाज के सामने गंभीर प्रश्न उपस्थित करता है।

इसमें लैंगिक अनुपात में सबसे ज्यादा अंतर अंतिम संतान के संदर्भ में देखा गया है जहां आखिरी संतान का पलड़ा बेटे के पक्ष में झुका हुआ है। जैववैज्ञानिक लिहाज से प्रकृति में एक लड़की पर 1.05 लड़कों का जन्म होता है। भारत में यह आंकड़ा प्रथम संतान पर 1.82, दूसरी संतान पर 1.55 और तीसरी संतान पर 1.65 का है। इसी असंतुलित होते लैंगिक अनुपात को लक्ष्य करते हुए नोबेल अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने खोई स्त्रियां (मिसिंग वीमैन) नामक अवधारणा विकसित की थी, जिसके तहत भारत में 1990 में 3.7 करोड़ लड़कियां या तो गर्भ के समय ही मार दी जाती हैं या फिर पैदा होने के बाद उपेक्षा के कारण। वह आंकड़ा 2014 में 6.3 करोड़ तक पहुंच गया है। इस बीच 2005-06 से 2015-16 के बीच कामकाजी महिलाओं की संख्या 36 प्रतिशत से गिरकर 24 प्रतिशत तक आ गई है।

अर्थशास्त्री सीमा के ये आंकड़े भारतीय समाज का आईना हैं, जिसमें इस देश के विभिन्न प्रांत अपनी तुलना दूसरे राज्यों से कर सकते हैं और अपने देश की तुलना दूसरे देश से भी कर सकते हैं। सीमा का आंकड़ा भी बताता है कि जहां विकसित क्षेत्र दक्षिण पूर्व एशिया के देश इंडोनेशिया में जन्म और अंतिम संतान के संदर्भ में लैंगिक अनुपात प्रकृति के करीब है वहीं भारत के पंजाब और हरियाणा जैसे विकसित राज्य विपरीत दिशा में भाग रहे हैं। उम्मीद की किरण केरल और मेघालय जैसे छोटे लेकिन, मातृसत्ता वाले राज्यों से दिखाई देती है। यह चुनौती सरकार, समाज और बाजार तीनों के लिए है। अगर यह संस्थाएं पूर्वग्रह से नहीं उबरेंगी तो ऐसे दारुण आंकड़े उपस्थित होते रहेंगे।

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