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‘वेस्ट से वेल्थ’ का सूत्र अपनाने से ही बचेगी हमारी खेती

अंडर 3Y: करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

Danik Bhaskar | Mar 10, 2018, 05:39 AM IST

‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गोबरधन (गैलवनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्स धन) योजना की चर्चा करते हुए कहा कि मवेशियों के गोबर से बायो गैस और जैविक खाद बनाई जाए। रासायनिक खाद के इस्तेमाल से उपजे विकार अब इस दुनिया के सामने चिंता का कारण बन गए हैं, क्योंकि रासायनिक खाद डालने से शुरू के वर्षों में तो पैदावार जमकर होती है लेकिन, फिर जमीन की उर्वरता दिन-ब-दिन घटने लगती है और किसान ऋण के बोझ तले दबते जाते हैं। वही गोबर से बनी प्राकृतिक खाद से जमीन की अवशोषण क्षमता कई गुना बढ़ जाती है फलस्वरूप जमीन में नमी भी बनी रहती है और उर्वरता बढ़ जाती है।


राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष स्वामीनाथन की रिपोर्ट के मुताबिक किसानों की ख़ुदकुशी करने की कई वजहों में एक सिंचाई जल की मात्रा और गुणवता में कमी आना भी है। दरअसल, रासायनिक खाद और दवाओं के कारण भूमिगत जल के दूषित होने का भी संकट पैदा हो गया है और अभी तक ऐसी कोई तकनीक विकसित नहीं की गई है कि जिससे भूमिगत जल रसायनों से अलग किया जा सके।


भारत में मवेशियों की आबादी लगभग 30 करोड़ है और गोबर का उत्पादन प्रतिदिन लगभग 30 लाख टन है। कुछ यूरोपीय देश पशुओं के गोबर और अन्य जैविक अपशिष्टों का उपयोग ऊर्जा के उत्पादन के लिए करते है और अब भारत में भी पूरी क्षमता से इसका उपयोग शुरू होगा। गोबर गैस प्लांट गैस सिलेंडर के मुकाबले कम खर्च में खाना पकाने और बिजली बनाने में भी उपयोगी है। गोबर गैस प्लांट से निकला हुआ कचरा भी खाद का काम करता है और वेस्ट से वेल्थ, वेस्ट से एनर्जी की उपयोगिता साबित करने में कारगार हो सकता है।

गोबर के उपयोग से महंगी रासायनिक खाद और दवाओं का भारी खर्च भी कम होगा और रसायनहीन फसल भी होगी। खेती के उपकरणों के कारण निरुपयोगी हो चुके पशुधन का भी उपयोग हो सकेगा। जरूरत तो सरकार के ठोस प्रयासों की रहेगी जो इस योजना को अमली जामा पहना सके।

राम करण सेन, 19
इंटीग्रेटेड एमएससी, स्टेटिस्टिक्स राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय
sainramkaran98@gmail.com