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बुद्धि का उचित प्रयोग कर विलक्षण बनें

जीवन में सफल होने के लिए केवल बुद्धिमान होने से काम नहीं चलेगा। हमें विलक्षण भी होना पड़ेगा। क्या फर्क है इन दोनों में?

Dainik Bhaskar

Dec 09, 2017, 06:48 AM IST
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जीवन में सफल होने के लिए केवल बुद्धिमान होने से काम नहीं चलेगा। हमें विलक्षण भी होना पड़ेगा। क्या फर्क है इन दोनों में? बुद्धिमान होना परिश्रम है, एक व्यवस्थित प्रक्रिया है और इसमें शिक्षा सहयोग करती है। बुद्धि हम सबके भीतर होती है, क्योंकि शरीर का अंग मस्तिष्क है और मस्तिष्क में बुद्धि दी गई है। किसी के पास कम होगी, किसी के पास ज्यादा हो सकती है। यह एक इंस्ट्रुमेंट है, जो भगवान ने हमें दिया है। इसका थोड़ा-सा उपयोग कर लें तो बुद्धिमान हो जाएंगे। लेकिन, बुद्धि जब सार्वजनिक रूप से, निजी, पारिवारिक और व्यावसायिक रूप से सदुपयोग में आ जाए और अच्छे परिणाम दे दे उसे विलक्षणता कहते हैं। आपने कारोबार में कामयाबी हासिल कर ली और परिवार में कलह चल रहा है। परिवार संभाल लिया, धंधा ठीक चल रहा है पर निजी रूप से परेशान हैं। यदि सबकुछ ठीक हो और समाज या राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं तो समझ लीजिए बुद्धि का आधा ही उपयोग हो पा रहा है और आप विलक्षण होने से चूक रहे हैं। बुद्धि विलक्षण तब होती है या बुद्धिमान व्यक्ति अपने आपको विलक्षण तब मानें जब वह उक्त चारों क्षेत्र में पूरी तरह से सकारात्मक परिणाम दे सके। यदि इन चारों के प्रति जागरूक नहीं हैं तो एक न एक दिन आपका मन बुद्धि से वह काम करवा लेगा, जिसके सामने आने पर छवि खराब हो सकती है, प्रतिष्ठा गिर सकती है। आप अपराधी भी बन सकते हैं। बुद्धि का वैसा उपयोग कीजिए, जिसके लिए ईश्वर ने यह दी है। फिर आपको विलक्षण होने से कोई नहीं रोक सकता।


पं. विजयशंकर मेहता
humarehanuman@gmail.com

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