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यरुशलम विरोध के बावजूद नेतन्याहू भारत में

इजरायली प्रधानमंत्री की भारत यात्रा और दोनों देशों के बीच सहयोग की बढ़ती संभावनाएं

Ved Pratap Vaidik | Last Modified - Jan 13, 2018, 03:31 AM IST

  • यरुशलम विरोध के बावजूद नेतन्याहू भारत में
    वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू 14 जनवरी को भारत आ रहे हैं। किसी इजरायली प्रधानमंत्री की यह दूसरी भारत-यात्रा है। पहली यात्रा 2003 में प्रधानमंत्री एरियल शेरों ने की थी। इन पिछले 14-15 वर्षों में भारत-इजरायल संबंधों का नक्शा ही बदल चुका है। इस बीच भारत के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री भी इजरायल हो आए हैं। इजरायल के राष्ट्रपति रुवेन रिवलिन भी 2016 में भारत आ चुके हैं। नरेंद्र मोदी भारत के एकमात्र प्रधानमंत्री हैं, जो पिछले साल इजरायल गए थे। जवाहरलाल नेहरू ने 1950 में इजरायल को मान्यता दी थी, क्योंकि मिस्र ने उस समय हैदराबाद के सवाल पर पाकिस्तान का समर्थन कर दिया था। वरना 1948 में बने इजरायल को भारत संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाने के भी विरुद्ध था। 1992 में नरसिंह राव ने पहल की और इजरायल के साथ राजनयिक रिश्ते स्थापित किए।


    उस समय इजरायल से घनिष्ट संबंध बनाने में भारत को कई तरह के संकोच थे। सबसे पहला तो यही कि इजरायल के नज़दीक जाने का अर्थ होगा दुनिया के दर्जनों मुस्लिम देशों से अपने संबंधों में खटास पैदा करना। दूसरा, गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता बनना और साथ-साथ उसके सबसे बड़े विरोधी, अमेरिका, के संपोषित राष्ट्र के करीब जाना। तीसरा, इजरायल की घनिष्टता भारत-सोवियत संबंधों के भी अनुकूल नहीं होती। चौथा, उन दिनों इजरायल स्वयं अस्तित्व के संकट में फंसा हुआ था। उसकी दोस्ती के फायदों के बारे में अनिश्चय बना हुआ था। पांचवां, न तो भारत में यहूदी लाॅबी इतनी तगड़ी थी और न ही इजरायल में भारतीयों की संख्या इतनी अधिक और वजनदार थी कि दोनों देशों में घनिष्टता बनाने का दबाव बढ़ता। उन दिनों इजरायल से भारत इतना परहेज करता था कि भारतीय पासपोर्ट पर इजरायली वीजा भी नहीं लग सकता था। लगभग 50 साल पहले जब मैं न्यूयॉर्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ता था तो मेरा भाषण सुनने के बाद इजरायल राजदूत ने मुझे इजरायल-यात्रा का निमंत्रण दिया। हमारे दूतावास ने मुझे विशेष पासपोर्ट दिया, जिस पर इजरायल वीजे का ठप्पा लगाया गया था। वह पासपोर्ट मेरे पास आज भी है।


    यह स्थिति बदली कैसे? इसका मूल कारण इजरायल ही है। भारत ने कई मुद्‌दों पर इजरायल का विरोध किया लेकिन, इजरायल ने हर संकट में हमारा साथ दिया। संयुक्त राष्ट्र में जब भी कश्मीर का सवाल उठा, इजरायल ने भारत के पक्ष में वोट किया। पाकिस्तान के साथ हुए 1965 और 1971 के युद्धों में इजरायल ने भारत का कूटनीतिक समर्थन ही नहीं किया अपितु, सैन्य-सहायता भी की। इसके विपरीत अरब राष्ट्रों के साथ भारत की घनिष्टता के बावजूद उन्होंने पाकिस्तान का समर्थन किया। कारगिल-युद्ध के समय पश्चिम एशिया के ज्यादातर राष्ट्रों ने पाकिस्तान का समर्थन किया लेकिन, इजरायल ने हमारा साथ दिया। इजरायल की इस लगातार भारत-समर्थक नीति का असर भारत के नीति-निर्माताओं पर बढ़ता गया। मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री-काल में इजरायल के जगत्प्रसिद्ध रक्षामंत्री मोशे दयान गोपनीय यात्रा पर भारत आए थे। भारत और इजरायल के बीच व्यापारिक, सामरिक और गुप्तचरीय सहयोग बढ़ता गया। 1962 में चीनी हमले के समय इजरायल ने सामरिक सहयोग की जो पहल की थी, वह चुपचाप आगे बढ़ती रही। 2003 में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने इजरायली प्रधानमंत्री शेरों को भारत आमंत्रित करके यह संदेश दे दिया कि अब इजरायल से भारत के संबंध खुले आम बढ़ेंगे। भारत ने इजरायल के विरुद्ध पारित कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रस्तावों पर तटस्थता भी प्रकट की। नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री के तौर पर पहले इजरायल जा चुके थे लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर इजरायल जाने के पहले उन्होंने कई अरब देशों की यात्राएं कीं और फिलीस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को भारत का मेहमान बनाया। लेकिन मोदी ने पिछले साल इजरायल-यात्रा के दौरान वह काम कर दिखाया, जिसे करने की हिम्मत इजरायल के परम मित्र डोनाल्ड ट्रम्प में भी नहीं है। ट्रम्प मई 2017 में इजरायल के साथ फिलीस्तीन भी गए लेकिन मोदी ने सिर्फ इजरायल यात्रा की।


    गत वर्ष मोदी की इजरायल-यात्रा ने नरसिंहराव की इजरायल नीति को शिखर पर तो पहुंचाया ही, उसने जनसंघ और भाजपा की इजरायल-नीति को अमली जामा पहनाया। नरसिंहराव स्वयं इजरायल जाना चाहते थे लेकिन, उन दिनों छिड़े साम्प्रदायिक विवादों के कारण उन्हें अपना इरादा बदलना पड़ा था। इजरायल से हम खुले-आम संबंध दो कारणों से नहीं बना रहे थे। एक तो मुसलमान मतदाताओं के नाराज़ होने के डर से और दूसरा अरब देशों के साथ तनाव बढ़ने की आशंका से! लेकिन ये दोनों कारण खोखले हैं। इजरायल और फिलीस्तीन का झगड़ा मजहबी नहीं, जमीनी है। फिलीस्तीनी जमीन पर इजरायली कब्जा है। खुद फिलीस्तीनी लोग सऊदी लोगों की तरह कट्‌टर इस्लामी नहीं हैं और इजरायल की स्थापना करनेवाले कुछ बड़े नेता यहूदी जरूर थे लेकिन, वे कम्युनिस्ट थे। धर्म से दोनों का कुछ लेना-देना नहीं है। इसी प्रकार अरब देशों की नाराजी का सवाल भी नकली है, क्योंकि इजरायल का सबसे बड़ा संरक्षक अमेरिका है और सऊद अरब, मिस्र, जार्डन, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात आदि प्रमुख राष्ट्र अमेरिका के अंधभक्त हैं।


    इजरायली प्रधानमंत्री इस अप्रिय तथ्य के बावजूद भारत आ रहे हैं कि यरुशलम को राजधानी बनाने के सवाल पर भारत ने अभी-अभी इजरायल और अमेरिका के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र में वोट दिया है। भारत ने इजरायल के साथ अरबों रुपए का प्रक्षेपास्त्र सौदा भी रद्‌द कर दिया है लेकिन, फिर भी नेतन्याहू भारत उत्साहपूर्वक आ रहे हैं, क्योंकि भारत के साथ इजरायली हथियारों का व्यापार जोरों पर है। उसके लगभग आधे हथियार अकेला भारत खरीदता है। आतंकवाद, गुप्तचरी, कृषि, विज्ञान, अंतरिक्ष-विद्या आदि कई क्षेत्रों में सहयोग की अनंत संभावनाएं हैं। भारत चाहे तो इजरायल-फिलीस्तीन विवाद सुलझाने में भी सक्रिय भूमिका निभा सकता है। मोदी यह नया आयाम खोजकर क्यों नहीं देखें? लेकिन इजरायल से घनिष्टता का कोई असर भारत-ईरान संबंधों पर न पड़े। भारत को खुश रखने में इजरायल का गहरा निहित स्वार्थ है। उसे प्रचंड आर्थिक लाभ तो होता ही है, उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि भी सुधरती है।(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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