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अपने भीतर का भक्त जरूर बचाकर रखें

अपने अधिकार को भुला दें, छोड़ दें। निष्कामता का अर्थ है अपने कर्मफल के प्रति आसक्ति न रखें।

vijay shankar mehta | Last Modified - Jan 24, 2018, 06:34 AM IST

  • अपने भीतर का भक्त जरूर बचाकर रखें

    वैसे तो ऐसे दृश्य देखने को कम मिलते हैं कि नदी किनारे कोई मछलीमार बैठा मछलियों को फंसा रहा हो। यदि कहीं ऐसा देखने में आए भी तो ध्यान से देखिएगा कि मछलीमार की डोरी में एक कांटा लगा होता है, जिस पर वह आटा लपेटता है। मछली आटा खाने आती है और कांटे में फंस जाती है। इसी बात को आध्यात्मिक दृष्टि से देखिए। जब हम भक्ति कर रहे होते हैं, एक धार्मिक व्यक्ति होते हैं तो कामना के कांटे में फंस गए होते हैं।

    इसे यूं समझें कि भक्ति आटा है और उसके पीछे का कांटा हमारी कामना या वासना है। ऐसे में हम जैसे ही अपनी भक्ति को लेने गए, उसके पीछे लगे कामना के कांटे के कारण भक्ति तो प्राप्त कर नहीं पाते, उल्टे वासनाओं में उलझ जाते हैं। इसीलिए शास्त्रों ने एक शब्द दिया है- ‘निष्काम भक्ति’। निष्काम भक्ति का मतलब है आप एक ऐसा कर्म कर रहे हैं, जिसका परिणाम ईश्वर पर छोड़ चुके हैं। कर आप रहे हैं, करवा कोई और रहा है, यह भाव निष्काम भक्ति से आता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि अपने अधिकार को भुला दें, छोड़ दें। निष्कामता का अर्थ है अपने कर्मफल के प्रति आसक्ति न रखें।

    निष्कामता बताती है कि असफल भी रहें तो शांति को नहीं खोते हुए प्रयास की ताकत को और बढ़ा देना है। एक भक्त जब कोई काम करता है तो अपने आपको पूरा झोंक देता है। एकाग्रता उसका गहना होती है। इसलिए आप कोई भी व्यक्ति हों, अपने भीतर का भक्त जरूर बचाकर रखिएगा।

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Web Title: Vijay Shankar Mehta Talking About Inner Devotee
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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