जीने की राह

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नियमित और व्यवस्थित होने का प्रयत्न करें

विज्ञान कहता है ये पंचतत्व भौतिक विकास में सहयोगी हैं।

Dainik Bhaskar

Jan 18, 2018, 04:49 AM IST
पं. िवजयशंकर मेहता पं. िवजयशंकर मेहता

शास्त्रों में कहा गया है कि परमात्मा व्रतस्थ है। यानी उसने कुछ ऐसे नियम बनाए हैं जिनका पालन वह स्वयं भी करता है। परमात्मा अपनी पहली झलक प्रकृति में दिखाता है। प्रकृति के पांच तत्वों को हर धर्म अपने हिसाब से स्वीकारता है। विज्ञान धर्म से कितना ही पीठ मोड़ ले पर पृथ्वी, जल, वायु, अग्रि और आकाश इन पंचतत्वों का उपयोग धर्म जिस ढंग से करता है, वह भी उसी तरीके से करता है।

धर्म कहता है ये पंचतत्व हमारे भीतर हैं, मनुष्य के आत्मिक विकास में सहयोगी हैं। विज्ञान कहता है ये पंचतत्व भौतिक विकास में सहयोगी हैं। धर्म कहता है इनका संरक्षण करते हुए जीवन के लिए लाभ उठाओ, विज्ञान कहता है इनको नोचना भी पड़े तो नोच लो और फायदा उठा लो। लेकिन परमात्मा कहता है कि जब हम प्रकृति से जुड़ें, पंचतत्वों का उपयोग करें तो हमें व्रतस्थ होना चाहिए। यानी हमारे भीतर अनुशासन होना चाहिए। प्रकृति के मामले में अनुशासन का अर्थ है नियमित और व्यवस्थित होना।

नियमित का मतलब जो चौबीस घंटे आपको मिले हैं उसमें काल के अनुसार काम कीजिए। सोने के समय सोइए, उठने के समय उठिए, भोजन के समय भोजन कीजिए। उचित समय पर भोजन किया जाए यह नियमितता है और क्या-कैसे-कितना खाया जाए, अन्न की गुणवत्ता और शुद्धता क्या हो इसका मतलब है व्यवस्थित होना। इसलिए शास्त्रों से सीखना चाहिए कि व्रतस्थ होते हुए जो भी काम करें उसमें नियमित और व्यवस्थित होने का प्रयास किया जाए।

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पं. िवजयशंकर मेहतापं. िवजयशंकर मेहता
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