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जो भीतर है वैसी ही वाणी और कर्म हो

प्रयोग यह कीजिए कि जब किसी की प्रशंसा करें तो उसमें दिखावा न हो।

vijayshankar mehta | Last Modified - Dec 16, 2017, 06:55 AM IST

  • जो भीतर है वैसी ही वाणी और कर्म हो

    सादगी में भी बहुत ताकत होती है। प्रदर्शन अपने आपमें खोखलापन है। यदि इस खोखलेपन को सही ढंग से न भरा जाए तो यह पाखंड बनकर परेशानी में डाल सकता है। अपनी सादगी को ताकत बनाना हो तो कुछ प्रयोग करते रहिएगा। सादगी का अर्थ दिखने में ही नहीं है, यह समूचा आचरण है। जब आप सोचने में, करने में और बोलने में एक जैसे होने लगते हैं तो समझो सादगी को स्पर्श कर रहे होते हैं।

    प्रयोग यह कीजिए कि जब किसी की प्रशंसा करें तो उसमें दिखावा न हो। जिस तथ्य या घटना को लेकर किसी की प्रशंसा की जा रही हो उसे ठीक से समझें, फिर कुछ कहें। ऐसे ही जब किसी की निंदा करना हो तो आलोचना और निंदा का फर्क समझिए। आलोचना करुणा लेकर चलती है और निंदा शुरुआत में ही घृणा ले आती है। आप किसी को जगाना चाहें, सही मार्ग पर लाना चाहें तो आलोचना कीजिए और किसी को मिटाने की नीयत हो तो निंदा करें। जिनके व्यक्तित्व में सादगी होती है वो सबको अपने साथ उठाते हैं। इसलिए आलोचना भी करना पड़ सकती है। सादगीपूर्ण व्यक्तित्व कभी किसी को दबाता नहीं है और जैसे ही निंदा करेंगे, आप सामने वाले को दबाएंगे। भीतर सादगी उतरते ही आप सबके लिए मैत्रीपूर्ण हो जाते हैं। इसलिए सादगी को ताकत बनाना हो तो प्रशंसा और आलोचना का फर्क समझना ही होगा। जब भी किसी से मिलें इन तीनों बातों का तालमेल सही तरीके से बैठाएं कि जो आपके भीतर है वही वाणी में हो और इन दोनों के मुताबिक ही काम भी कर रहे हों।

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Web Title: Vijayshankar Mehta Talking About Human Work
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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