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बुद्धि को प्रज्ञा बनाएं तो अशांति से बचेंगे

साधारण भाषा में कहें तो उनको बुद्धिमान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। लेकिन, इस बात की भी चिंता पालें कि आज बुद्धिमान

Danik Bhaskar | Dec 22, 2017, 05:02 AM IST
पं. विजयशंकर मेहता पं. विजयशंकर मेहता

आजकल इस बात पर बहुत तेजी से शोध हो रहा है कि बुद्धिमान लोग अशांत क्यों पाए जाते हैं? यह पढ़ने-लिखने का युग है। हम बच्चों को खूब पढ़ा भी रहे हैं। साधारण भाषा में कहें तो उनको बुद्धिमान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। लेकिन, इस बात की भी चिंता पालें कि आज बुद्धिमान लोग परेशान भी बहुत हैं। अशांति मानो बुद्धि का बॉय-प्रोडक्ट बन गई है।

शांति के साधन सहज उपलब्ध हैं, लेकिन बुद्धि उसमें भी आड़े आ जाती है। बुद्धि बिना तर्क के कुछ स्वीकार नहीं करती। जीवन में शांति पाने के लिए कहीं न कहीं अतार्किक, शून्य होना पड़ेगा। इस दौर में तो बुद्धिमान होने का मतलब भी बदल गया है। समझा जाने लगा है कि बुद्धिमान वही जो दमन में माहिर हो, दूसरों को पछाड़कर आगे निकल जाए, षड्यंत्र कर सके, जिसे शोषण का तरीका आता हो और जो भ्रष्टाचार करते हुए भी भ्रष्ट न दिखे। ये हो गए हैं बुद्धिमानी के मापदंड। पिछले दो-चार साल का हिसाब निकालें तो खबरों में पाएंगे, हर गलत काम बुद्धिमान व्यक्ति ने किया है। ऐसा क्यों हो रहा है? इसीलिए कि बुद्धि का मतलब ठीक से नहीं समझा जा रहा है।

बुद्धिमान व्यक्ति यदि शांत होना चाहता है तो बुद्धि को परिष्कृत कर प्रज्ञा में बदलना पड़ेगा। प्रज्ञा को मात्र शास्त्रों का आदर्श शब्द न मान लें। इसका अर्थ होता है आत्मा की निकटता वाली बुद्धि। अभी बुद्धि की निकटता केवल शरीर से है। यदि योग के प्रयोग करें तो बुद्धि आत्मा की ओर बढ़ेगी, प्रज्ञा का रूप लेगी। जिसने बुद्धि को प्रज्ञा होने का स्वाद चखा दिया, वह अशांति से बच जाएगा।