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कथा के संदेश और सूत्र को जीवन से जोड़ें

व्रत का मतलब एक ऐसा संकल्प जो सत्य के निर्वाह में मदद करे।

Dainik Bhaskar

Dec 20, 2017, 07:17 AM IST
पं. विजयशंकर मेहता पं. विजयशंकर मेहता

नई पीढ़ी जिन शब्दों से बिदकती है उनमें एक है कथा। आजकल के बच्चों को यदि कहा जाए कि कथा सुन लें या पढ़ लें तो वे अरुचि जाहिर करते हैं। उनके लिए तो कथा सुनना बड़े-बूढ़ों का ही काम है और कथा कहने वाले सिर्फ स्वयं का हित साध रहे होते हैं। लेकिन, उन्हें यह भी समझना होगा कि यदि कथा को गंभीरता से ले लिया, उसकी सतह के नीचे के संदेश को पकड़ लिया तो फिर बेशक कथा छोड़ दीजिए।

हमारे यहां सत्यनारायण व्रत कथा बहुत लोकप्रिय है। लोग अपने घरों में और सार्वजनिक रूप से इसे करवाते हैं परंतु नई पीढ़ी इसे एकदम ही खारिज कर देती है। उनको इससे कोई मतलब नहीं होता। लेकिन, यदि थोड़ा टिकते हुए उसके पीछे का संदेश पकड़ें तो वह है- सत्य। इस कथा के लिए कहा जाता है कि इसमें डराया गया है। तो क्या भगवान डराता है? ईश्वर न तो किसी का अहित करता है और न किसी में भय पैदा करता है। उसकी अपनी एक व्यवस्था, एक नियम है जो है सत्य। कथा में सत्य का बड़ा अच्छा उपदेश देते हुए उसे व्रत से जोड़ा गया है। व्रत का मतलब एक ऐसा संकल्प जो सत्य के निर्वाह में मदद करे।

यह कथा कहती है कि बिना शांत हुए सत्य नहीं पाया जा सकता। सत्य शांति में मदद करेगा और शांति की वृत्ति सत्य तक पहुंचाने में मददगार होगी। लगभग हर कथा अपने साथ ऐसा ही संदेश लेकर चलती है। फिर, इन्हें क्यों नकारा जाए? धैर्य के साथ कथा में प्रवेश करें, उसके सूत्र और संदेश को जीवन से जोड़ें। फिर देखिए, हर कथा आपके लिए एक उपाय बन जाएगी।

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पं. विजयशंकर मेहतापं. विजयशंकर मेहता
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