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शिव-पार्वती की तरह दांपत्य को दिव्यता दें

माता-पिता और संतान, यदि इनका तालमेल ठीक हो तो भारत के परिवारों को कोई तोड़ नहीं सकता।

Danik Bhaskar | Feb 14, 2018, 07:58 AM IST
पं. िवजयशंकर मेहता पं. िवजयशंकर मेहता

भगवान शिव और पार्वती के दांपत्य की जितनी भी विशेषताएं हैं उनमें सबसे बड़ी खासियत है कि ये पति-पत्नी जब अकेले में रहते हैं तो दांपत्य के उस एकांत को दिव्यता में बदल लेते हैं। शिवरात्रि के पर्व का सबसे बड़ा संदेश ही यह है कि भारत के परिवारों के केंद्र में जो रिश्ता है वह पति-पत्नी का है। यह रिश्ता सार्वजनिक रूप से बड़ा प्रेमपूर्ण लगता है। पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति समर्पित भी लगते हैं, लेकिन इस रिश्ते की वास्तविकता तब सामने आती है जब स्त्री-पुरुष पति-पत्नी के रूप में एकांत में होते हैं। पार्वतीजी बहुत सुलझी हुई महिला थीं।

दांपत्य के एकांत में उन्होंने पति शिव से जो प्रश्न पूछे थे, उसी वार्तालाप को संसार रामकथा के रूप में जानता है। धीरे-धीरे पार्वतीजी गहन प्रश्न पूछती गईं, शिवजी उत्तर देते गए। संसार को योगसूत्र, तंत्रसूत्र जैसा साहित्य भी अपने परस्पर वार्तालाप से इस दिव्य युगल ने ही दिया। आज अगर पति-पत्नी अपने एकांत को बचा लें, अकेले रहकर प्रेमपूर्ण हो जाएं, ईमानदार हो जाएं तो इसका सबसे बड़ा असर पड़ता है संतान पर। माता-पिता और संतान, यदि इनका तालमेल ठीक हो तो भारत के परिवारों को कोई तोड़ नहीं सकता।

इसलिए शिवरात्रि का पर्व परिवारों में विशेष रूप से मनाया जाए, यह मानकर कि केंद्र में जो पति-पत्नी का रिश्ता है वह शिव-पार्वती जैसा हो। दिव्य एकांत, आपसी समझ और संतानों के प्रति एक खास सूझ-बूझ का नाम है शिव और पार्वती।