--Advertisement--

संकट के समय दूरदृष्टि व दिव्यदृष्टि रखें

पशु के पास संभावना होती है कि जब कोई उसका शिकार या हिंसक आक्रमण करने आए तो वह भाग सकता है।

Danik Bhaskar | Dec 28, 2017, 07:48 AM IST
पं. िवजयशंकर मेहता पं. िवजयशंकर मेहता

मनुष्य, पशु और पेड़, इनमें सबसे बड़ी समानता है तीनों में प्राण होते हैं और उनकी रक्षा के लिए तीनों ही अपने ढंग से प्रयास करते हैं। पेड़ सबसे ज्यादा लाचार होता है। जब कोई जानवर उसे खाता है या मनुष्य काटता है तो वह न भाग सकता है, न प्रतिकार कर सकता है। लेकिन, उसकी पीड़ा समझी जा सकती है। पशु के पास संभावना होती है कि जब कोई उसका शिकार या हिंसक आक्रमण करने आए तो वह भाग सकता है।

मनुष्य के पास और अधिक संभावना होती है। वह अधिकांश मौकों पर शिकारी है लेकिन, कभी-कभी खुद भी शिकार हो जाता है। इंसान जब मुसीबतों से घिरा हो तो उसे दो दृष्टियां रखनी चाहिए- दूरदृष्टि और दिव्य दृष्टि यानी अपने भीतर उतरना। हम मनुष्य हैं तो हमारे पास पेड़ और पशु दोनों की संभावनाएं हैं। जिस समय हम समस्या के सामने हों और खुद को पेड़ की तरह असहाय महसूस करें तब दिव्य दृष्टि से काम लीजिए। जब अपने भीतर उतरेंगे तो आपको ऐसी शक्ति मिलेगी जो बाहर की समस्याओं से निपटने में मदद करेगी। जब लगे कि आप पशु की तरह भाग सकते हैं पर शिकार करने वाला छोड़ेगा नहीं, तब दूरदृष्टि पर काम कीजिए।

दूरदृष्टि से भी शक्ति प्राप्त होती है जो संसार के साधनों की होती है। समस्या आए तो संसार के साधनों पर दूरदृष्टि रखिए और जब भीषण परेशानी से सामना हो तो अपने भीतर की शक्ति को प्राप्त करने के लिए दिव्यदृष्टि रखिए। हो सकता है कभी आप पेड़ की और कभी पशु की तरह लाचार हों पर उस लाचारी में ये दोनों दृष्टि आपके बड़े काम आएगी।