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खुशी: लड़ी इसलिए कि लांछन हारे, महिला जीते

अच्छाई की ज़िद को अपनी ज़िंदगी बनाएं, अच्छाई बची तो जीवन बचेगा

Dainik Bhaskar

Mar 05, 2018, 03:04 AM IST
रूपरेखा वर्मा- महिला अधिकार कार्यकर्ता, प्रमुख ‘साझी दुनिया’ रूपरेखा वर्मा- महिला अधिकार कार्यकर्ता, प्रमुख ‘साझी दुनिया’

ज़िंदगी, संघर्ष और उम्मीद का मेरे जीवन से बड़ा गहरा रिश्ता रहा है। मैंने हमेशा अच्छी ज़िद पाली है, उसके लिए लड़ी और संघर्ष किया है फिर जीती हूं। अब तो मैं लखनऊ में अपने संगठन के जरिये दूसरे लोगों के संघर्षों और मुकामों को आवाज और स्थान देती हूं पर मेरे जीवन में भी कठिनाई आई थी। कठिनाई बहुत बड़ी और पूरी तरह बिखेर देने वाली थी।


मैं उन दिनों लखनऊ विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष थी। दो लोगों के प्रमोशन होने थे, लेकिन पद एक ही था। ऐसे में एक का प्रमोशन हो गया मगर जिसका नहीं हुआ उसने मुझ पर हर स्तर पर हमले किए। पहले वैचारिक विभेद के नाम पर उन्होंने मेरे खिलाफ गोलबंदी की। पहला हमला साम्प्रदायिक और जातिवादी तरीकों से किया। साल-डेढ़ साल तक मेरे खिलाफ अखबारों में खूब छपा। मुझे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए, बल्कि मेरा खूब चरित्र हनन किया गया। इस बीच मेरे पिता घर में गिर गए थे और वे कोमा में थे। मेरी मां अखबारों में छपने वाली खबरों से बहुत घबरा चुकी थीं। मैं जब विश्वविद्यालय से आती वे यही कहतीं कि तुम यह नौकरी छोड़ दो, घर में रहो, क्या रखा है इस नौकरी में, जिसमें इज्जत भी सलामत नहीं है। पर मेरे लिए यह करो या मरो की हालत थी। छात्रों और शिक्षकों के बीच भी बहुत भ्रम फैल चुका था और सभी मुझे अजीब निगाहों से देखते। ऐसे में अगर मैं नौकरी छोड़कर भाग आती तो मुझ पर लगाए जा रहे सभी आरोप स्वत: सच साबित मान लिए जाते। उनका झूठ, सच की तरह हमारी पीढ़ियों में किस्सों के रूप में चर्चित हो जाता।


लड़ना मैंने इसलिए भी जरूरी समझा कि हम आज़ादी के बाद नौकरी पाई पहली पीढ़ी की महिलाएं थीं। हमारा हारना आने वाली लड़कियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर देता, उन्हें बदनाम करने और हाशिये पर डालने वालों के हौसले और बढ़ जाते। मेरी इस ज़िद के कारण मुझे शारीरिक हमलों की भी धमकी दी गई। धमकाने वाले पूरे रास्ते का चित्र बताकर कहते कि कैसे बचोगी? दो मुकदमे भी दर्ज कर दिए गए पर मैंने हार नहीं मानी। लड़ी और दोनों मुकदमे जीते। मुझ पर जो आरोप लगाए थे सब गलत साबित हुए और मैंने अपने साथी शिक्षकों, छात्रों और परिवार में खोया सम्मान हासिल किया।


इस लंबे व्यक्तिगत संघर्ष में मैंने कुछ खोया, यह तो याद नहीं पर इस अच्छी ज़िद ने मुझे और समाज को जो साहस, दृष्टि और दुनिया को समझने का मौका दिया वह जरूर याद करने लायक है। और मैं मानती हूं कि हमें संघर्ष का साहस हमारे सामाजिक माहौल से मिला। आज़ादी के बाद पूरे देश में बहुत ही सकारात्मक माहौल था। वे लोग समाज के आदर्श होते थे या चर्चा में रहते थे, जो मुंहफट थे और सही बात कहते थे। हम जिन भी बैठकों, सेमीनारों या प्रदर्शनों में शामिल होते, लोग यही बातें करते कि उनकी देश को बेहतर बनाने में कितनी बड़ी भागीदारी या भूमिका हो सकती है।


उसी सकारात्मक परम्परा की देन मैं खुद में आज भी महसूस करती हूं। यही वजह है कि आने वाली पीड़ित लड़कियों का बिना झुके और दबे साथ दे पाती हूं। साहस और समझदारी का मेल बनाने का काम साहित्य ने भी बहुत किया। प्रेमचंद और राहुल सांस्कृत्यायन को पढ़कर मैं बड़ी हुई। मेरे पिता पेशे से डॉक्टर थे पर साहित्य के प्रति उनमें गहरा रुझान था। मां पांचवीं पास थीं, मगर कविताएं लिखती-सुनती थीं। मेरी बड़ी बहन भी साहित्य में बहुत रुची रखती थीं।


मैं मानती हूं कि जिं़दगी के हर हिस्से में साहित्य एक रोशनाई की तरह होता है, जिससे आप आजीवन समाज को अपने ज्ञान और संवेदना से रंगते रहते हैं, अच्छा इंसान बनाने की नर्सरी लगाते हैं। बगैर साहित्य संवेदना नहीं आ सकती और बगैर संवेदना आप एक अच्छा समाज नहीं बना सकते। आमिर खान के चर्चित कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ में मुझे जब बुलाया गया तो मैं एक दुष्कर्म का मामला लेकर गई थी। वह मेरी एक सहकर्मी का था। वह लखनऊ के मडियाहूं थाने के इलाके में अकेली रहती थी। वह जिसके मकान में रहती थी उसी के भांजे ने रात में दीवारों के रास्ते चढ़कर, बाथरूम के रास्ते घुसकर दुष्कर्म किया था। लेकिन वह इतनी साहसी थी कि रात के डेढ़ बजे अकेले पैदल चलकर दो किलोमीटर थाने गई और मुकदमा दर्ज कराया। किंतु विश्वविद्यालय उसके साथ खड़ा नहीं हुआ। लोग तरह-तरह की बातें करते रहे। इस मामले में मुझ पर अदालत में हमले भी हुए। पर मैं हर सुनवाई में उसके साथ गई और आरोपी को सजा हुई।


ऐसे अनगिनत वाकये हैं जो मैं साथियों के साथ मिलकर निपटाती हूं। अब अच्छा लगता है कि अच्छी जि़द पालने वालों का कारवां बढ़ता जा रहा है। कई बार मुझे अपनी पेंशन के पैसे लगाने पड़ते हैं, पर खुशी होती है। हमारी संस्था की दो लड़कियां अभी वकील बनीं हैं और उन्होंने तय किया है कि वे जरूरतमंदों के लिए मुकदमे लड़ेंगी। हमारी कोशिश है कि हमारी अच्छाई की ज़िद को लोग अपनी ज़िंदगी बनाएं, क्योंकि ज़िंदगी तभी बचेगी जब आप अच्छे के लिए लड़ेंगे।
(जैसा उन्होंने अजय प्रकाश को बताया)

रूपरेखा वर्मा
महिला अधिकार कार्यकर्ता, प्रमुख ‘साझी दुनिया’

Women rights activist  Professor Roop Rekha Verma
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Women rights activist  Professor Roop Rekha Verma
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