आंकड़ों के जादूगर थे 'बीमारू' के जनक

8 वर्ष पहले
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यह दुख:दायी है कि चुनाव की आपाधापी और विकास के दावों-प्रतिदावों के बीच उस शख्स के दुनिया से अचानक चले जाने से मीडिया लगभग बेखबर रहा, जिसने विकास व पिछड़ेपन को परिभाषित कर बहस का विषय बनाया था।

मैं बात कर रहा हूं प्रोफेसर आशीष बोस की, जिनका दिल्ली में गुरुवार को 84 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। जनसंख्या शास्त्र विशेषज्ञ बोस 'बीमारू' राज्यों की कल्पना के जनक थे। 1985 में देश के नए प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनसे राज्यों के पिछड़ेपन के कारण पूछकर उनसे निजात पाने के लिए सलाह मांगी। बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान व उत्तरप्रदेश की विशाल आबादी को देखते हुए बोस ने उनके पहले अंग्रेजी अक्षरों (BIMARU) का उपयोग कर इन पिछड़े राज्यों के वर्गीकरण को 'बीमारू' नाम दिया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि आबादी पर काम करना है तो इन चार राज्यों पर गौर करना होगा। उनके गढ़े गए शब्द 'बीमारू' ने इन राज्यों को आर्थिक बहस के केंद्र में ला दिया। योजना आयोग ने भी आगे चलकर 'बीमारू' राज्यों पर पैनी नजर रखनी शुरू की और उनके लिए आर्थिक मदद बढ़ाई।

यही उनकी खासियत थी। वे कहते थे कि आंकड़ों की बाजीगरी में खोने की बजाय निष्कर्ष निकालना ज्यादा जरूरी है। इसीलिए आंकड़ों से खेलने वाले बोस किस्सों में अपनी बात बेबाकी से रखते थे। देश में जनसंख्या शास्त्र (डेमोग्राफी) के शैशवकाल में ही 70-80 के दशक में बोस इस दिशा में काम प्रारंभ कर चुके थे। तब कटु आर्थिक यथार्थ को गोलमोल भाषा में परोसा जाता था। बोस ने इस परंपरा को तोड़ा। उनके 'बीमारू' ने इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को नाराज कर दिया था। चीन की तरक्की पर उनकी बेबाक राय थी कि वे इससे प्रभावित नहीं, क्योंकि वहां आजादी नहीं है। जनसंख्या शास्त्र में विशेषज्ञता उन्होंने ऐसे समय हासिल की थी, जब विकास के पैमाने पर राज्यों में तुलना किए जाने का दौर नहीं था। वे स्वास्थ्य सूचकांक, शिक्षा का स्तर, बढ़ती आबादी के दबाव में आते अर्थशास्त्र के सिद्धांतों आदि के बारे में बातें करते व शोध में लगे रहते थे। उन्होंने 25 किताबें लिखीं।

आर्थिक उदारीकरण के पहले राज्यों के हालात कैसे थे, यह किसी से छुपा नहीं है। आज जब गुजरात के विकास मॉडल पर गंभीर बहस छिड़ी है या विकास को लेकर जनता में जागरूकता आई है तो इसका काफी कुछ श्रेय बोस को है। अब इन चार राज्यों और 'बीमारू क्लब' में बाद में शामिल किए गए ओडिशा में विकास की छटपटाहट दिख रही है। मध्यप्रदेश 'बीमारू' से बाहर निकल गया है और ताजा आंकड़ें (जीएसडीपी) बताते हैं कि राज्यों की विकास दर में वह प्रथम स्थान पर है। कुछ लोग राजस्थान की प्रगति की बातें करते हैं वैसे ही जैसे बिहार की, जहां नीतीश कुमार शासन ने अपने अच्छे कामों से लालू राज को लगभग भुला दिया है।

ओडिशा और उत्तरप्रदेश अभी भी बीमार हैं। गुजरात, तमिलनाडु, केरल या महाराष्ट्र जैसी प्रगति बाकी राज्यों से भी अपेक्षित है। देश की विकास दर तभी 10-12 प्रतिशत तक पहुंच सकेगी। बोस के निधन के पश्चात ही सही 'बीमारू' का भी अवसान हो तो भारत खुशनसीब होगा।

लेखक दिव्य मराठी, महाराष्ट्र के स्टेट एडिटर हैं।

abhilash@dainikbhaskargroup.com