आंबेडकर के संविधान पर बना लोकतंत्र खतरे में / आंबेडकर के संविधान पर बना लोकतंत्र खतरे में

बेजवाड़ा विल्सन

Apr 14, 2017, 09:08 AM IST

डॉ. आंबेडकर जयंती: देश में हर तरह की गैर-बराबरी के खात्मे और जाति के ध्वंस की प्रेरक विचारधारा

ambedkar constitution based democracy in danger
भारतीय राजनीतिक-सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देश के संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर आज भी अपनी पूरी धमक और असर के साथ मौजूद हैं। यह उनके विचारों की ताकत है कि उनके योगदान की अनदेखी करने या गलत ढंग से पेश करने की तमाम नापाक कोशिशों के बावजूद अांबेडकरवादी विचारधारा देश के कोने-कोने में जय भीम के नारे के साथ अपनी धार को बरकरार रखे हुए हैं। विचारधारा का यह उद्‌घोष सिर्फ दलित मुक्ति और दलित सशक्तिकरण का ही पर्याय नहीं बल्कि वंचितों तथा हाशिये पर ढकेले गए लोगों के संघर्ष और संविधान की रक्षा के लिए लामबंद हो रहे तबकों का हमसफर बना हुआ है।

आंबेडकर की विचारधारा की मजबूती और प्रासंगिकता को इस बात से समझा जा सकता है कि जिस विचारधारा ने अांबेडकर के होते उनका कभी समर्थन नहीं किया, कट्‌टर विरोध किया, उसे भी आज जब अधिकारों, लोकतंत्र, समानता, संविधान की बात करनी पड़ती है तो उन्हें अांबेडर का नाम लेना पड़ता है। चुनावों से लेकर सामाजिक परिर्वतन के तमाम आंदोलनों में अांबेडकर की चर्चा अवश्यंभावी हो गई है। मार्के की बात यह है कि अांबेडकर की यह उपस्थिति उनके अपने योगदान की वजह से कायम है, वरना उन्हें हाशिये पर डालने की हरसंभव कोशिश उनके जीते-जी ही शुरू हो गई थी। आज भी खतरा उन्हीं ताकतों से है, जो समाज में यथास्थितिवाद, मनुवाद या जातिगत दंश को कायम रखना चाहते हैं।

अांबेडकर ने समाज में जाति और लिंग आधारित भेदभाव की गहरी जड़ों का पर्दाफाश किया। उन्होंने न सिर्फ समाज की इस नग्न सच्चाई को बेबाकी और साहस के साथ सामने रखा, बल्कि इससे मुक्ति की राह भी दिखाई। वे आधुनिक दार्शनिक व क्रांतिकारी विचारों से लैस मशाल के तौर पर आज भी जिंदा हैं।

भारतीय समाज का निर्माण ही जाति के आधार पर हुआ है। हमारे समाज में जाति व्यवस्था सबसे बड़ी क्रूरता और हिंसा का रूप है। हिंसा को यह जायज ठहराता है और भेदभाव को गहरी जड़ें मुहैया कराता है। आज भी हमारे 6.40 लाख गांव जाति के आधार पर बंटे हुए हैं। शहर भी जाति के दंश से कतई अछूते नहीं हैं। जाति की गंदगी हमारे दिमागों में घुस गई है। जाति का सबसे विद्रुप और अमानवीय चेहरा मैला ढोने की प्रथा के रूप में आज भी भारतीय समाज में मौजूद है। इस कुप्रथा से भारतीय समाज को जरा भी परेशानी नहीं होती। हमारे नीति-निर्माताओं को इस बात से कोई तकलीफ नहीं होती कि वे हजारों भारतीय नागरिकों की सीवर और सेप्टिक टैंक में हत्या कर चुके हैं। इस कुप्रथा के चालू रहने से हमारी संस्कृति और भारतीय राष्ट्रीयता की धज्जियां नहीं उड़ती? अगर वंचित तबके का कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करे तो हमारी नीति उसे सजा देने की रही है। ऐसा मुंबई प्रीसिडेंसी में अांबेडकर के समय हुआ। उस समय एक कानून था कि अगर सफाई कामगार एक दिन मैला न साफ करे तो उसे जुर्माना देना पड़ता था। भारतीय इतिहास में इसका विरोध करने का साहस सिर्फ अांबेडकर ने दिखाया। उन्होंने प्राइवेट मेंबर बिल के जरिये यह कानून निरस्त करवाया। ऐसा नहीं कि यह नाइंसाफी खत्म हो गई है। विकास के ढेरों नारों से घिरा हुआ हमारा देश कब मैला मुक्त होगा, यह किसी की चिंता का सबब नहीं है।

हमारे नेताओं की छाती इस बात पर जरूरी फूलती रहती है कि देश के पास अग्नी छह जैसी मिसाइल है जो 10 हजार किलोमीटर दूर बैठे शत्रु को ध्वंस कर सकती हैं लेकिन, इस बात पर उन्हें कोई शर्म नहीं आती है कि 5-10 फीट नीचे बनी सीवर-सेप्टिक लाइनों को साफ करने के लिए कोई तकनीक देश के पास नहीं है। मिथैन गैस से भरे इन गैस चैंबरों (सीवर-सेप्टिक टैंक) में अब तक हजारों दलित मारे जा चुके हैं। इन हत्याओं को हमारा समाज देखने तक को तैयार नहीं है, रोकने की बात तो बहुत दूर की है। वजह जाति के दोष से ग्रसित हमारी नज़र कोई भी मानवीय पहलू को देखने में सक्षम नहीं रह गई है।

आज देश में हर तरफ नकली राष्ट्रवाद की हिंसक ध्वनियां सुनाई दे रही हैं। देश को एक ही रंग में रंगने, एक ही तरह की सोच, रहन-सहन, खान-पान में ढालने की साजिशें जोरों पर हैं। इन्हें सरकारी समर्थन मिला हुआ हैं। हमारे समाज में एक जानवर की खातिर इंसान को मारना जायज ठहराया जा रहा है। अखलाक और पहलू खान को सरेआम वहशी भीड़ मार रही है। दलितों को जाति आधारित कामकाज करने पर मजबूर किया जा रहा है, जिसका प्रतिकार हमें मैला ढोने वाली महिलाओं द्वारा टोकरियों को जलाने और गुजरात के ऊना में दलितों द्वार मरे जानवरों को उठाने से इनकार करने में दिखाई दिया। विडंबना यह है कि आज जब हम आंबेडकर को याद कर रहे हैं तब उनके द्वारा बनाया गया संविधान और उस पर आधारित हमारा लोकतंत्र गहरे संकट में है। अ-संवैधानिक (एक्स्ट्रा) और गैर-संवैधानिक ताकतों को राजनीतिक वरदहस्त प्राप्त है। साधु हो या योगी या मुख्यमंत्री सब खुलेआम विरोधियों और उनके विचारों का समर्थन न करने वाले लोगों का सिर काटने की बात कर रहे हैं। हम दिल जोड़ने की बजाय सिर काटने में दक्ष होते जा रहे हैं, जबकि ऐसी धमकी देना आईपीसी के तहत दंडनीय अपराध है, लेकिन अभी तक किसी को सजा नहीं हुई। तार्किकता और अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम चलाने वालों पर हमले तेज हुए हैं। नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पंसारे, एमएम कालबुर्गी और दलित लेखक कृष्ण किरवाले की हत्या करने वाली सोच प्रबल हो रही है।

ये बाबा साहेब आंबेडकर के सपनों का भारत नहीं है। आंबेडकर आजीवन जाति के ध्वंस, मनुस्मृति के दहन और तमाम गैर-बराबरी के खात्मे के लिए संघर्षशील रहे। जाति के खात्मे और गैर-बराबरी से मुक्ति के लिए हमें आंबेडकर का चश्मा चाहिए। स्त्री मुक्ति के वे अगुआ थे। उनका यह वक्तव्य हमारे लिए हमेशा समाज को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता रहेगा, ‘मैं यह सामाजिक रथ बहुत कठिनाइयों से यहां तक लाया हूँं। हो सके तो इसे कठिनाइयों के बावजूद आगे, और आगे लेकर चलो। अगर इसे आगे नहीं ले जा सकते तो यहीं छोड़ दो लेकिन, इसे किसी भी कीमत पर पीछे मत ले जाओ।’
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
बेजवाड़ा विल्सन
मैगसेसे अवॉर्ड से सम्मानित
सोशल एक्टिविस्ट
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