अन्य

--Advertisement--

आस्था और तर्क के अंधरे में भटकता समाज

फिल्म पद्‌मावतीपर उठा विवाद देखकर लगता है कि भारत आस्था और तर्क के अंधेरे बंद कमरे में भटक गया है।

Danik Bhaskar

Nov 25, 2017, 07:15 AM IST

फिल्म पद्‌मावतीपर उठा विवाद देखकर लगता है कि भारत आस्था और तर्क के अंधेरे बंद कमरे में भटक गया है। एक तरफ आस्थाविहीन तर्क है तो दूसरी तरफ तर्कविहीन आस्था है। उसे तो दरवाजा मिल रहा है और ही खिड़की। इस विवाद ने हमारी सोच और लोकतांत्रिक ताने-बाने को सिर्फ नुकसान पहुंचाया है, जिसकी पूर्ति होने में समय लगेगा।


इसने आस्था की उस डोर को भी खंडित किया है जो कभी भारत के ऋषियों ने बनाई थी और जिसमें डूबकर मलिक मोहम्मद जायसी ने ‘पद्‌मावत’ लिखा था। ये घटनाएं साबित करती हैं कि तानाशाही तो भय पर चलती ही है लेकिन, लोकतंत्र ने भी निर्भय नागरिकता को तिरस्कृत कर दिया है और उसने सत्य, अहिंसा जैसी अपनी मूल मान्यताओं को खंडित किया है। उसके चुनावी लोभ ने विवेक को खामोशी की नींद सुलाने की तैयारी की है। समाज के प्रतीकों और आस्थाओं पर सवाल खड़ा करने वाले या तो मार दिए जाते हैं या जेल भेज दिए जाते हैं, जबकि सरकार उन लोगों के आगे लाचार लगती है जो अफवाह, आस्था और कुतर्क की तलवारें भांजते हुए असहमति को आतंकित करते हैं।
सवाल उठता है कि समाधान क्या है? कुछ लोग मानते हैं कि सरकारें बदल देने से अफवाह, आस्था और कुतर्क का सहारा लेने वालों की हिम्मत पस्त हो जाएगी और तब यह समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। दूसरे लोगों का मानना है कि सवाल चेतना का है और जब तक तथ्य, वैज्ञानिक परीक्षण और तर्क पर आधारित संस्कृति नहीं बनेगी तब तक यह सब होता रहेगा। इसलिए एक प्रकार की सांस्कृतिक क्रांति बेहद जरूरी है। दूसरी तरफ ‘आस्थावादियों’ का मानना है कि पश्चिम की ईसाइयत और मध्यपूर्व की इस्लामी संस्कृति के प्रभाव में भारत की मूल संस्कृति को बहुत आहत किया गया है इसलिए यह सब हो रहा है। इसीलिए इतिहास को फिर से लिख दिए जाने के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा और तब हिंदू संस्कृति की उदारता भी प्रकट होगी।


ये दोनों अलग-अलग छोर हैं और उनके बीच में कोई निर्मल धारा नहीं बहती बल्कि बहुत सारा कचरा है। मीडिया के लाइक, डिसलाइक, कमेंट, ट्वीट, रीट्वीट और टीआरपी के आधार पर तय हो रहा है कि कौन जीता कौन हारा। सत्ता, समृद्धि और प्रसिद्धि की दौड़ में हमारा समाज आस्था और तर्क के अंधेरे बंद कमरे में भटक गया है। उसे मुक्ति का आकाश मिल रहा है और ही चेतना की अतल गहराई, ही मैत्री और सुख-शांति। उसका ज्ञान मात्र सूचनाओं में सिमट गया है और विद्या पैकेज और कॅरियर की दासी हो गई है। किसी में सत्य जानने की इच्छा है और ही साहस। हमारे उच्च शिक्षा संस्थान और उनमें बैठे प्रगतिशील विद्वानों ने अपने ज्ञान और तर्क के प्रति समाज में विश्वास और आस्था विकसित करने का प्रयास नहीं किया और अब तर्कविरोधी और आस्थावादी लोग पाखंडपूर्ण आस्था और निराधार विश्वास को ही ज्ञान घोषित कर रहे हैं। ज्ञान के केंद्रों से दूर बैठा इस देश का ग्रामीण और आदिवासी समाज उतनी घृणा और ईर्ष्या में नहीं जीता जितना इस देश का शिक्षित और उच्चशिक्षित समाज। चाहे प्रगतिशील इतिहास लेखन हो या मिथकवादी इतिहास लेखन दोनों में साजिश के सिद्धांत की एक वेगमयी धारा प्रवाहित होती रहती है। यही धारा एक जाति को दूसरी जाति के और एक धर्म को दूसरे धर्म के विरुद्ध खड़ा करती है। यही इतिहास को मिथक बनाना चाहती है और मिथक को इतिहास। एक तरफ तर्क करने वालों की आस्था है तो दूसरी तरफ आस्थावादियों के तर्क।


ऐसे ही लोगों के लिए रामकृष्ण परमहंस ने ब्रह्मसमाज के प्रकांड विद्वान केशवचंद्र सेन से कहा था, ‘केशव तुम्हारी साधना में आने वाले लोग मुझे दक्षिणेश्वर मंदिर में आने वाले बंदरों के सदृश लगते हैं जो थोड़ी देर तो शांत रहते हैं और बाद में कोई आम के पेड़ पर टूट पड़ता है तो कोई अमरूद, कोई तरबूज तो केला और कंकड़ी नोचने लगता है।’ परमहंस ऐसा इसलिए कह सकें क्योंकि वे पोथी पढ़ने वाले विद्वान नहीं थे। वे सच्ची आत्म अनुभूति वाले संत थे और उनके लिए ईश्वर (प्रकृति) के लौकिक और पारलौकिक रूपों में कोई भेद नहीं था। उनके लिए विभिन्न धर्मों को मानने वाले हिंदू, मुस्लिम, ईसाई में भी कोई भेद नहीं था। जिस अंतरात्मा के माध्यम से सत्य का साक्षात्कार परमहंस करते थे वही पद्धति स्वाधीनता संग्राम और बीसवीं सदी के सबसे बड़े नेता महात्मा गांधी भी करते थे। यही वजह थी कि वे अछूत ब्राह्मण, हिंदू- मुस्लिम और भारतीयों अंग्रेजों में आंतरिक रूप से कोई भेद नहीं करते थे। उनकी अंतरात्मा की आवाज मानवता को लक्षित थी और इसीलिए कभी उनकी आस्था तर्क पर भारी पड़ती थी और कभी उनके तर्क आस्था पर, जिसे कई बार तर्कवादी समझ नहीं पाते थे। जब किसी में मानवता के लिए आस्था पैदा हो जाती तो उनके तर्क समाप्त हो जाते। इसीलिए उनके व्यक्तित्व में संत और राजनीतिज्ञ का अद्‌भुत मिलन था और वे कह सकते थे कि मैं समस्त हिंदू धर्मग्रंथों में विश्वास करता हूं लेकिन, अपने विवेक के अनुसार उसमें बदलाव की छूट लेता हूं।
आज एक तरफ हमारी वे संस्थाएं हैं जिन्हें संविधान सभा के महान सदस्यों ने निर्मित किया है और लगभग उन्हीं के साथ खड़े हैं वे वस्तुनिष्ठ और तथ्यपरक प्रसिद्ध इतिहासकार जो कहते हैं इतिहास और मिथक को अलग रखना चाहिए। संविधान और तर्क के इसी सिद्धांत के आधार पर यह विमर्श रचा जाता है कि रचनाकार को अधिकतम छूट देनी चाहिए और कला पर प्रतिबंध लगाने की रफ्तार धीमी होनी चाहिए। लेकिन, दूसरी तरफ वे लोग हैं जिनका मानना है कि इस देश के संविधानवादियों और वस्तुनिष्ठ तथ्यपरक इतिहास के रचने वालों ने उनकी परम्परा को नष्ट किया है। उनके जख्मों को भरने का प्रयास ही नहीं किया। भला कोई देश और समाज अपने आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के मार्ग में इतनी बड़ी खाई लेकर कैसे आगे बढ़ सकता है। इसका रास्ता उसी अंतःप्रकाश से निकलेगा, जिसे पाकर डिग्रीविहीन भक्तिकाल के सगुण और निर्गुण धारा के कबीर, दादू, रैदास, सूर, तुलसी जैसे तमाम कवि एक दूसरे से बहुत भिन्न रहते होते हुए भी एक-दूसरे के प्रति आदर और प्रेम रखते थे। वे किसी भी व्यवस्था से भयभीत नहीं थे। इतिहास का मकसद तो नए युद्ध की प्रेरणा देना है और ही आस्था का उद्‌देश्य विरोध के लिए विरोध और पराये की खोज उसके प्रति घृणा पैदा करना है। (येलेखक के अपने विचार हैं।)

अरुण कुमार त्रिपाठी प्रोफेसरएडजंक्ट, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा tripathiarunk@gmail.com

Click to listen..