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सुभाषित की तरह जीने, लिखने वाले कुंवर नारायण

लंबी बीमारीके बाद बुधवार को कुंवर नारायण नहीं रहे।

अोम निश्चल | Last Modified - Nov 17, 2017, 04:45 AM IST

सुभाषित की तरह जीने, लिखने वाले कुंवर नारायण

लंबी बीमारीके बाद बुधवार को कुंवर नारायण नहीं रहे। साहित्य जगत में लगभग अजातशत्रु कुंवर नारायण हिंदी के अकेले ऐसे कवि हैं, जिनकी कविताओं का भारतीय भाषाओं समेत दुनियाभर की तमाम भाषाओं में अनुवाद हुआ है। वे अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के सहयोगी कवियों में रहे हैं।


उनके कैशोर्य काल में परिजनों की मृत्यु के कारण उनके भीतर पैदा हुए विषाद ने उनके कवि को कुछ अलग ढंग से गढ़ा। ‘चक्रव्यूह’ और ‘आत्मजयी’ उसी दौर की रचनाएं हैं। आत्मजयी’ के केंद्र में नचिकेता है तो ‘वाजश्रवा के बहाने’ के केंद्र में नचिकेता के पिता वाजश्रवा। ‘अपने सामने’ के साथ वे सरल होते गए किंतु अनुभूति और संवेदना सघन होती गई। कविता जीवन से जुड़ती गई। अपनी डायरी में उन्होंने लिखा है ‘एक कविता होती है जीवन के बारे में। एक जीवन में प्रवेश कर जाने वाली कविता होती है’।


कुंवरजी की कविताएं पढ़ते हुए मस्तिष्क और दिल पर एक ऐसा प्रभाव पड़ता है, जिसे साफ-साफ बयान नहीं किया जा सकता। उनके शब्द अपना आतंक नहीं जमाते, वे हमें हौले-हौले उस जगह ले जाते हैं, जहां कविता सच्चे अर्थों में चरितार्थ होती है। उन्होंने स्वयं कहा है, ‘मेरी कविताएं तीखी-तर्रार रेखाओं से नहीं बनतीं। उनमें गाढ़े-हल्के रंग के उमड़ते-घुमड़ते बादलों के-से आकार एक-दूसरे में घुलते-मिलते हैं। उन्होंने अनेक विदेश यात्राएं की हैं। पोलैंड के विनाश को देखकर युद्ध और उपनिवेशवाद के अनुभवों का सूक्ष्म प्रभाव उनकी कविता पर पड़ा।


प्रारंभ में अनेक समाजवादियों, कलाकारों, लेखकों से हुई उनकी मुलाकातों से साहित्य के बारे में उनकी समझ परिपक्व हुई। लखनऊ स्थित उनका घर साहित्यकारों, कलाकारों, संगीतकारों, फिल्मकारों का स्थायी ठिकाना था। लखनऊ में रहते हुए उनका अमृतलाल नागर, शिवानी, ठाकुरप्रसाद सिंह, रघुवीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी, श्रीलाल शुक्ल, कृष्ण नारायण कक्कड़, गिरिधर गोपाल मुद्राराक्षस आदि से नियमित संपर्क-संवाद रहा। अब इनमें से कोई भी नहीं है। कलाओं के शौकीन इतने कि उनके घर के बरामदे में ही एक बार लखनऊ पधारी संयुक्ता पाणिग्रही ने श्रीलाल शुक्ल, केशवचंद्र वर्मा, सुरेश अवस्थी ठाकुर जयदेव सिंह के समक्ष अपना नृत्य प्रस्तुत किया। शतरंज के खिलाड़ी फिल्म बनने के दौरान सत्यजित राय के लखनऊ आने पर कई बार मुलाकातें हुईं। इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ जैसे साहित्य-संस्कृति संपन्न शहर अब धीरे-धीरे उजड़ रहे हैं। माल और बाजार कल्चर उन्हें आमूल बदल रहा है। इस बदलाव और संकट के प्रतिबिम्ब कुंवरजी की कविता में सूक्ष्मता से आते रहे हैं।


उन्होंने कहानियां थोड़ी ही लिखी हैं पर वे किस्सागोई की बेहतरीन नक्काशी का नमूना हों जैसे। ‘आकारों के आसपास’ में शामिल सभी कहानियां मनुष्य के चित्त को बारीकी से पढ़ती हैं और अपने संवादों और कथोपकथनों से मुग्ध करती हैं। इन कहानियों को देखें तो यह धारणा टूटती है कि कवि की कहानी में दार्शनिकता का बघार ज्यादा होता है कहानी कम। उन्होंने अपने ऊपर कभी किसी विचारधारा का दबाव महसूस नहीं किया। वे लेखक की स्वायत्तता को किसी भी विचारधारा से ऊपर मानते रहे हैं। जैसे रचना में, वैसे ही आलोचना में भी किसी पंथ, किसी भी मत का समर्थन उन्होंने नहीं किया। वे यह कोशिश करते रहे हैं कि शुद्ध, निष्पक्ष और अकादमिक समीक्षा का एक उत्तरदायी संसार हिंदी में विकसित हो।


उनका प्रबंध काव्य ‘वाजश्रवा के बहाने’ में पिता और पुत्र के बीच केवल दो पीढ़ियों के बीच के अंतराल का मसला है बल्कि यह दो दृष्टियों के बीच के अंतराल का भी मामला है। जब भी नई दृष्टियां पुरानी दृष्टियों से टकराती हैं, जीवन को नया अर्थ मिलता हैं। कवि के शब्दों में-
- कुछ इस तरह भी पढ़ी जा
सकती है एक जीवन-दृष्टि
कि उसमें विनम्र अभिलाषाएं हों
बर्बर महत्वाकांक्षाएं नहीं,
वाणी में कवित्व हो
कर्कश तर्क-वितर्क का घमासान नहीं,
कल्पना में इंद्रधनुषों के रंग हों
ईर्ष्या-द्वेष के बदरंग हादसे नहीं,
निकट संबंधों के माध्यम से बोलता हो पास-पड़ोस,
और एक सुभाषित, एक श्लोक की तरह सुगठित
और अकाट्य हो जीवन-विवेक।
उनका जीवन, उनका काव्य एक सुगठित श्लोक और एक सुभाषित की तरह पठनीय संग्रहणीय है। उनके जीवन और साहित्य पर केंद्रित पुस्तक ‘अन्वय’ एवं ‘अन्विति’ के संपादन के सिलसिले उनसे कई बार घंटों बातचीत का अवसर मिला है। उनसे बातचीत कर रचनात्मक समृद्धि का अहसास होता था। वे कहा करते थे, ‘साहित्य में राजनीति के दुर्गुण गए हैं पर साहित्य के गुण राजनीति में नहीं।’ पढ़ने-लिखने के हिमायतियों की सिकुड़ती दुनिया के बारे में उनका कहना था ‘गुन ना हिरानो गुनगाहक हिरानो है।’ एक बार मुलाकात में उन्होंने अपनी डायरी ‘दिशाओं का खुला आकाश’ देते हुए हिटलर का वाक्य उद्‌धृत किया था : ‘नथिंग ऑफ इम्पार्टेन्स इज़ मियरली गिवेन टू मैन, इवरीथिंग मस्ट बी स्ट्रगल्ड फार।’ यानी अच्छी बातें वे हिटलर जैसे तानाशाह से भी ले सकते थे।
कुंवरजी ने लगभग साठ साल रचनात्मक रूप से सक्रिय रहते हुए सब कुछ लिखा, कविता, कहानी, आलोचना, डायरी भी, पर आत्मकथा नहीं। पता नहीं, आत्मकथा से क्यों बचते रहे। डायरी में भी अपने या औरों के बारे में निजी टिप्पणियां बिल्कुल नदारद हैं। शायद इसे आत्मश्लाघा या प्रायोजित प्रशंसा मानते रहे हों। इसकी क्या वजह हो सकती है? सोचते हुए मेरी निगाह एक दिन उनकी डायरी में दर्ज येव्तुशेन्को के इस वाक्य पर गई जिसमें लिखा था : ‘कवि की कविता ही उसकी आत्मकथा है, अन्य चीजें केवल फुटनोट।’ उनकी कविताओं के बीच उन्हें खोजना निश्चय ही एक कठिन काम है, क्योंकि उनकी कविताएं कल्पना और यथार्थ की बारीकियों में आवाजाही करती हैं। ‘वाजश्रवा के बहाने’ काव्य में एक वाक्य आता है: ‘मृत्यु इस पृथ्वी पर जीवन का अंतिम वक्तव्य नहीं है।’ जाहिर है, दिवंगत होकर भी वे अपनी कविताओं में सदैव जीवित रहेंगे। (येलेखक के अपने विचार हैं।)

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Web Title: subhaasit ki trh jine, likhne vaale kunvr naaraayn
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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