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कड़े सुधार लागू कर आधे-अधूरे को मुकम्मल बनाएं

पिछले वर्ष 8 नवंबर को प्रधानमंत्री के एक आदेश पर पूरे देश में 500 और 1000 के नोटों को आधी रात से अवैद्य घोषित कर दिया गय

Dainik Bhaskar

Nov 07, 2017, 05:07 AM IST
article by Shashank Kumar Rajak on demonetization
पिछले वर्ष 8 नवंबर को प्रधानमंत्री के एक आदेश पर पूरे देश में 500 और 1000 के नोटों को आधी रात से अवैद्य घोषित कर दिया गया। प्रधानमंत्री ने अपने उद्‌बोधन में इस ऐतिहासिक फैसले के चार प्रमुख उद्‌देश्य गिनाए थे - आतंकवाद, काला धन, जाली नोट और भ्रष्टाचार को समाप्त करना। परंतु बुिनयादी स्तर पर इस फैसले से कोई ठोस परिवर्तन देखने को नहीं मिला है। प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का एलान करते समय देश को यह बताया था कि जिन लोगों ने बड़ी मात्रा में काला धन एकत्र किया हुआ है वह उनके पास ही कागज के टुकड़े बन कर रह जाएंगे। परंतु, हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 99 फीसदी पुराने नोट बैकों में वापस आ गए हैं।

सरकार का कहना है कि अब वह इस जमा रािश के जरिये काले धन के जमाकताओं तक पहुंच जाएगी। परंतु ऐसा करने में बहुत समय लग सकता है और ऐसा करने के लिए टैक्स विभाग में जरूरी संसाधनों की भी कमी है। साथ ही नोटबंदी के तुरंत बाद सरकार ने मिशन मोड पर डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देना शुरू कर दिया और इसे नोटबंदी के एक मुख्य उद्‌देश्य के रूप में लोगों के सामने पेश किया। परंतु सरकार ने डिजिटल पेमेंट से संबंधित आधारभूत दिक्कतों का अब तक कोई पुरज़ोर समाधान नहीं किया है और अभी भी देश की एक बड़ी आबादी डिजिटल लेन-देन की अपेक्षा नोटों को तवज्जो दे रही है। सबकुछ आधा-अधूरा हो गया है। कोई चीज मुकम्मल नहीं है। आधार का मामला भी ऐसा ही है।

भ्रष्टाचार और काला धन भारत की सरकारी तंत्र में इस प्रकार घर कर चुके हैं कि किसी एक मास्टर स्ट्रोक के जरिये उन्हें पूरी तरह समाप्त कर पाना संभव नहीं हैं। नोटबंदी के साथ-साथ देश की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कर प्रणाली, नौकरशाही, चुनाव प्रक्रिया आदि क्षेत्रों में भी कड़े सुधारों के जरूरत है। निश्चित तौर पर सरकार का यह कदम साहसिक और ऐतिहािसक था परंतु इसके तात्कािलक दुष्परिणामों ने दीर्घकालीन फायदों का असर कम कर दिया। नोटबंदी के सालभर बाद भी सरकार अपने बयानों से मुकरती नज़र आ रही है और इस ऐतिहासिक कदम को सही दिशा देने में असफल दिख रही है।
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