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दिल्ली में फिर हो रहे हैं ऑड-ईवन जैसे तमाशे

हमारा ल्हासा नस्ल का टेरियर था टेडी। उसे भोजन के लिए तो कभी शिकार करना पड़ता नहीं था।

Dainik Bhaskar

Nov 14, 2017, 05:04 AM IST
Article By Shekhar Gupta On Odd-even

हमारा ल्हासा नस्ल का टेरियर था टेडी। उसे भोजन के लिए तो कभी शिकार करना पड़ता नहीं था। एक दिन उसे किचन में चूहा दिखाई दिया। उसने पीछा किया और घबराया चूहा रसोई गैस के सिलेंडर के पीछे फंस गया। टेडी ने उसे थोड़ी देर पकड़ा पर घबराकर छोड़ दिया शायद कुछ शर्मिंदगी के साथ। यह वाकया हमारे परिवार में लंबा चला। पहले इससे मेहमान का मनोरंजन होता। बाद में यह कहावत बन गई। ‘चूहा’ चिल्लाते ही टेडी सिलेंडर के पीछे चला जाता। उसे एक बार वहां चूहा मिला था तो वहीं होना चाहिए। कहावत इसलिए कि यदि कोई इस तरह की मूढ़ता दिखाता तो हम कहते चूहे को वहां मत खोजो जहां तुम्हें एक बार मिला था।


सारे डेटा बताते हंै कि दिल्ली की ‘आप’ सरकार ऑड-ईवन योजना में पहली बार ही सफल नहीं हुई थी पर यह राजनीतिक सफलता थी। दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध संबंधी पहले के लेख में हम देख ही चुके हैं कि यह किस तरह ‘मुझे कुछ करना है’ की भावना के अनुरूप है। ठंड के दो मौसम के बाद ‘आप’ सरकार फिर किचन में चूहे का पीछा करने आ गई है। ‘आप’ तो देश की पापुलिस्ट पार्टी हो गई है, ममता बनर्जी को भी टक्कर दे रही है। पर पापुलिस्ट तानाशाह की पार्टी के विपरीत इसमें विचारों और बुद्धिमत्ता की विविधता है। निचले स्तर पर पंजाब के इसके नेता सुखपाल सिंह खैरा रहे, जो खेतों की पराली जलाने के कार्यक्रम के अध्यक्ष बन गए। कहने लगे कि हर किसान को 5 हजार रुपए महीना नहीं दिया जाएगा तब तक किसान यही करेंगे, उधर दिल्ली में पार्टी सुप्रीमो ट्विटर पर कैप्टन अमिरंदर सिंह से मुलाकात चाह रहे थे।


अच्छा सवाल तो यह है कि क्या दिल्ली की हवा ही प्रदूषित है? नहीं, पूरे देश की यही हालत है। फिर दिल्ली को लेकर ही यह जुनून क्यों? सवाल तो अच्छा है पर देश के सबसे प्रभावशाली लोग यहां रहते हैं प्रधानमंत्री व पर्यावरण मंत्री सहित राजनेता, पर्यावरण सचिव सहित नौकरशाह, पर्यावरण पीठ के जजों सहित सुप्रीम कोर्ट के जज, सांसद, राजनयिक और मीडिया के दादा। यदि ये अपनी ही समस्या से नहीं निपट सकते तो खराब हवा, मरती नदियों, झाग उगलती झीलों और ढहते पहाड़ों के साथ शेष देश को क्या उम्मीद हो सकती है। यह तो किचन में चूहे खोजने जैसा ही है। नेशलन ग्रीन ट्राइब्यूनल जो भावनाएं, प्रयास और गुस्से का इस्तेमाल कर रहा है उसे देखकर तो इसका नाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र हरित न्यायालय कर देना चाहिए।


उसके फरमान तो ऐसे हैं कि तुगलग को भी उस पर गर्व हो जाए। अब एनजीटी ने निर्माण पर पाबंदी लगाकर सुर्खी बनाई है। आप चाहे कहें कि आर्थिक गतिविधियां रोकना प्रदूषण से लड़ने का तरीका नहीं हो सकता। निर्माण तो रुक जाएगा पर ठेकेदार को मजदूरों को मजदूरी देनी होगी। यदि आप मुझे एक ऐसा ठेकेदार खोजकर ला दें तो मैं आपको धान का ऐसा किसान बताऊंगा, जिसने एनजीटी के आदेश पर पराली जलाना बंद कर दिया है। सुर्खियों में आने से न चूक जाएं, इसलिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी कई नोटिस जारी कर दिए। गोरक्षकों की करतूतों पर कदम उठाने से तो यह सुरक्षित शर्मिंदगी है। फिर देश में सबसे लंबे चलने वाला स्थायी प्रतिष्ठान है : सुप्रीम कोर्ट के आदेश से गठित भूरेलाल समिति। यह सुप्रीम कोर्ट के 17 मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकालों से गुजरी है और दिल्ली की हवा की गुणवत्ता खराब ही होती गई है। राजधानी के सार्वजनिक परिवहन को सीएनजी पर लाकर इसने बहुत पहले फर्क पैदा किया था पर बाद में ज्यादा कुछ नहीं किया। उम्मीद है वह अपने पसंदीदा डीजल व ट्रक के पीछे पड़ेगी। इस विषैले पर्यावरण में हर निगारनी संस्था का चूहा किचन में है।


शिकायत करना कोई समाधान नहीं है पर हमें दिवाली से शुरू सुर्खियों वाले दो महीने छोड़कर बाकी दस पर ध्यान देना चाहिए। एक, हम माने की समस्या है। दो, हर किसी ने जो भी करने का प्रयास किया है वह काम नहीं दे रहा है। तीन, दोषारोपण और राजनीतिकरण से बचें। अब तथ्यों पर जाएं। ‘आप’ नेता आतिशी मर्लेना ने उत्तर भारत का स्मॉग मैप ट्वीट करके बताया कि यह दिल्ली की ही समस्या नहीं है, पूरे क्षेत्र का दम घुट रहा है। यह पहली समझदारी की बात है। इसीलिए मैंने कहा था कि ‘आप’ में बुद्धिमत्ता की विवधता है। और आगे जाएं तो पाकिस्तान के बड़े हिस्से भी ऐसे ही नज़र आएंगे। ठीक है पाकिस्तान के साथ कुछ करना चुनौतीपूर्ण है लेकिन, प्रधानमंत्री से याचना है कि वे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाएं। एक-दूसरे को दोष देना छोड़कर पराली न जलाने के लिए किसानों को मुआवजा देने का कोई तरीका खोजिए। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के आदेश पर डीजल व ट्रक एंट्री शुक्ल में सैकड़ों करोड़ एकत्रित किए हैं। दिल्ली के तमाशों से स्मॉग से निपटने की उम्मीद उतनी ही भ्रमपूर्ण है, जितना अस्थमा के घातक दौरे से निपटने के लिए मिंट की गोली खाने या कोई अगरबत्ती जलाने से उम्मीद रखना फिर चाहे वह पतंजलि या ऐसे ही किसी ब्रांड की ही क्यों न हो। फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बनी ईपीसीए रिपोर्ट पर गौर करें। वे बताती हैं कि दिल्ली के स्मॉग का 38 फीसदी धूल है। आसमान से स्प्रे करने या पेड़ों पर शॉवर के लिए फायर ब्रिगेड के इस्तेमाल जैसे मूढ़ विचार भूल जाएं। दिल्ली सरकार को सफाई की वे वेक्यूम मशीन खरीदने पर मजबूर करें, जिसका इसने 2016 में वादा किया था। फिर कम से कम कुछ डीटीसी बसें तो बदलें, जो सैकड़ों की संख्या में खराब हो रही हैं, जबकि सात वर्षों से एक भी नहीं खरीदी है। सरकार के पास नकदी नहीं है? उन्हें दिल्ली के मतदाताओं को खरीदने के लए मुफ्त और रियायती बिजली-पानी देने के पहले दो बार सोचना चाहिए था।


इन कदमों में ऑड-ईवन या प्रतिबंधों का मजा नहीं होगा लेकिन, इनसे मदद मिलेगी। बाकी तो सब हर स्मॉग-सीज़न में किया ही है। यह अत्याचार है। हम करोड़ों लोगों के साथ सामूहिक धोखा। इसे हम क्या कहें? चूंकि पत्रकारिता में सिनेमा जैसी रचनात्मक स्वतंत्रता नहीं है और मैं ‘इश्किया’ फिल्म में विशाल भारद्वाज द्वारा विद्या बालन से बुलवाया शब्द इस्तेमाल नहीं कर सकता तो आइए इसे कहें : ईवन-ऑडियम सल्फेट। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

शेखर गुप्ता
एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
Twitter@ShekharGupta

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Article By Shekhar Gupta On Odd-even
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