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असंभव के विरुद्ध: महिलाओं पर हमले करने वाले कितने हैं, पुलिस वाले कितने हैं और हम कितने हैं?

7 वर्ष पहले
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‘जो सब कर रहे हैं, आप भी वही कर रहे हैं तो ये मुख्यधारा में शामिल होना कतई नहीं है। ये तो कायरता का दबा छुपा रूप है- क्योंकि बहते पानी में तो मर चुकी मछली भी बह सकती है।’
- अज्ञात
कुछ नहीं, एक महिला चीख रही थी।
महिला स्वयं एक चीत्कार बनकर रह जाएगी?
पता नहीं, अरुणा शानबाग की तो चीख भी घुट गई थी।
वो कौन थी? निर्भया?
नहीं। सब भूल चुके हैं। नर्स, जो भयावह शिकार हुई थी। एक वार्ड बॉय सोहनलाल की दरिंदगी का। मुंबई के केइएम अस्पताल में। कुत्ते को बांधने वाली जंजीर से उसने ऐसा जकड़ा अरुणा को कि शरीर ने मरने से ही मना कर दिया। बस, रक्त जकड़ गया। नारी गरिमा पर हमले की सबसे हैवानी घटना थी वह। पिछले दिनों 41 साल पूरे हुए। और 41 सालों से ही ऐसी चीख चिंघाड़ रही है। चीखने वाली आवाज़ हर बार बदल जाती है। इतने समय से वह वार्ड नं. 4 में नर्सों की देखरेख में बिना हिले, बिना डुले हर पल मरती है। तीन साल पहले, उसकी लड़ाई लड़ चुकी पत्रकार पिंकी विरानी ने दया-मृत्यु का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया था। तब मानवीय आधार पर, अस्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सहयोगी नर्सों के योगदान को प्रभावी मानते हुए अरुणा की सेवा जारी रखने की बात कही थी। तब देशभर में सिर्फ सुर्खियों में आई थी।

फिर चीख घुटकर रह गई।
चीखें दम नहीं तोड़तीं।
दबा दी जाती हैं।

तब यदि कानून के रखवालों को कोई झंझोड़कर कहता कि महिलाएं उन्हें देख रही हैं – तो कोई तो जिंदा होता। बस में, टैक्सी में, सार्वजनिक स्थलों पर हैवान बन युवतियों को तबाह कर रहे हैं - उनमें अधिकतर पहले भी ऐसा पाप कर चुके थे। पुलिस ने उन्हें ऐसा फिर करने का अवसर दिया।
मुंबई में फोटो जर्नलिस्ट की गरिमा तार-तार करने वालों और उसके कारण बने पुलिस वालों पर ‘असंभव के विरुद्ध’ में आक्रामक प्रहार किया जा चुका है। सारे हमलावर कितने उन्मुक्त थे इतनी बड़ी, इतनी घिनौनी हरकत के बाद। एक दही-हांडी स्पर्धा में भाग लेने चला गया। एक चाय पीता रहा। पुलिस स्टेशन के पास। दो फिल्म देखने गए। इंटरवल में फोन पर पता चला कि साथियों को पुलिस पकड़कर ले गई। तो जांच में कबूला कि उसे आश्चर्य हुआ था कि ‘पुलिस क्यों ले गई’।

महिलाओं पर हमले करने वाले सारे अपराधी ऐसे ही पूछते हैं। वे मान ही नहीं पाते कि कभी पुलिस उनका कुछ कर भी सकती है।
सारे पुलिस वाले ऐसे तो नहीं हैं।
ऐसे निकृष्ट हो ही नहीं सकते।
इतने कायर क्योंकर होंगे?
कुछ, मुठ्‌ठीभर, साहसी भी होंगे।
कुछ अच्छे भी होंगे।
चुनिंदा अपराध और अपराधियों को तबाह करने का सपना और संकल्प लिए भी पुलिस में आए होंगे।
तो कहां हैं वे?
दिखलाई क्यों नहीं पड़ते?
एक दिन पहले ही तो शर्मसार हुए हैं सब। दिल्ली में जब नारी हमलावरों की लड़ाई उबर टैक्सी बंद करने या न करने पर बदली जा रही थी, तब इंदौर में एक नन्हीं बच्ची को प्रताड़ित किया जा रहा था। ऐसे में - दिल्ली में तो हैं नहीं - इंदौर में कोई जाबांज पुलिस वाला उभरता।
टीवी पर जब ‘मानसिकता बदलने की जरूरत’ जैसी उबकाई लाने वाली सीख दी जा रही होती है, तब ये खाकी वर्दी में सजे-संवरे कई बार इन बहस में भाग लेते दिखते हैं। फिर यह भी नहीं बता पाते कि युवतियों की चीख सुनकर ऐसे अविचलित वे कैसे रह पाते होंगे? उत्तरप्रदेश में छोटी-छोटी बच्चियों के ऐसे कायराना कृत्य का शिकार होने से उपजे उग्र प्रदर्शन के बाद एक विदेशी समाचार-पत्र ने कहा था : इस बीच, समूचे राज्य में पिछले 24 घंटों से दुष्कर्म की कोई खबर रिपोर्ट नहीं हुई है!

चूंकि देश में औसतन हर 21 मिनट में कोई न कोई महिला दुष्कर्म का शिकार होती है।
और हमारे सांसद बैठकर कानून बनाते रहते हैं।
हमारी पुलिस उन नई कानूनी धाराओं में पुरातन तरह से जांच करती है। अपराधियों को ढीला छोड़ देती है। फिर उन्हें गिरफ्तार करती है। फिर बोली। बिक्री। घूस। पाप।
कई तरह के दुष्कर्म।
फिर अदालतों से छूट जाते हैं। नए दुष्कर्म के लिए।
पश्चिम बंगाल में क्या हुआ? 13 घिनावने इसलिए एक महिला पर टूट पड़े, चूंकि गांव के बड़े बुज़ुर्गों की पंचायत का फैसला था। युवती का दोष था प्रेम।
कैसे कर सकती है एक महिला प्रेम?
पुलिस कोे सब पता था। कोलकाता से सवा सौ किलोमीटर दूर हुए उस पाप को पुलिस ने गांव का आपसी मामला कहकर टाल दिया।
कैसे? जि़न्दा तो सभी रहते हैं, जीवंत रहने के लिए कुछ तो ऐसा चाहिए कि मन में सुकून हो। पुलिस वाले भी तो आखिरकार इंसान होते हैं। कभी तो आत्मा कचोटती होगी? कभी तो पुलिस थाने झकझोरते होंगे? कि सांसदों के कानून बनाने का इंतजार क्यों कर रहे हो? अदालतों में जिरह होने और महिलाओं को और अपमानित करने की बाट क्यों जोह रहे हो? पहले ही इतना खौफ पैदा क्यों नहीं कर पाते कि हर दुष्कर्मी थर-थर कांप उठे।

किन्तु
थाने क्योंकर झकझोरेंगे?
थानों में तो साक्षात शैतान बसा होता है।
कुछ ही थानों में इंसान बसते हैं। कम ही थाने इंसानियत से चलते हैं। यह तो बहुत दूर की बात है।
अधिकतर थानों में कानून अंतिम सांस गिनता है। कुछ ही थाने कानून से चलते हैं। हमीरपुर भूल गए। युवती पर घिनौनी निगाह थी। पति को थाने में बंद कर दिया। पैसे मांगे। फिर बुलाया। चार पुलिस वाले।
चीख। वही अरुणा वाली। वही निर्भया वाली। वही फोटो जर्नलिस्ट वाली। नहीं सुनता कोई। चीख किन्तु दम नहीं तोड़ती।
मुख्यमंत्री से पत्रकार पूछ बैठी : लगातार दुष्कर्म क्यों हो रहे हैं, पुलिस क्यों सक्रिय नहीं है? तब उत्तरप्रदेश के ही नहीं, देश के युवा नेताओं के प्रेरक समझे जा रहे अखिलेश यादव ने कह दिया था : ‘आप तो सुरक्षित हैं ना? मत चिंता कीजिए।’
मीडिया चीखा था।

वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे विश्व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित आर्थिक अखबार ने भी एक पूरी किताब हमारे देश में उठ रही, दबाई जा रही चीत्कारों पर लिख दी है। जिस अखबार को भारत की बढ़ती समृद्धि पर अमेरिकी संदर्भ में चिंता होनी चाहिए या आर्थिक अर्थों में खुशी - वह हमें दुष्कर्म का देश बताकर चिंतित है, रोष जता रहा है। हम "टाइम' मैग्ज़ीन में मोदी "पर्सन ऑफ द ईयर' क्यों नहीं चुने गए जैसे निरर्थक, अकर्मण्य विषय पर बात कर ऊर्जा व्यर्थ कर रहे हैं।

महिलाएं हाहाकार कर रही हैं।
सिर्फ शिकार महिलाएं।

हमारे निर्वाचित नेतृत्व हाहाकार कर रहे हैं कि धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। कोई इसे ऐच्छिक कहकर स्वेच्छाचारिता कर रहा है, तो कोई जबरदस्ती बताकर कानों पर अत्याचार।
धर्म तो महिलाओं को समानता देने का है, इसे सचमुच परिवर्तित करना होगा।
कितने होंगे जो नारी गरिमा पर हमला कर सकते हैं, करना चाहते हैं?
कुल कितने अपराधी होंगे ऐसे?
भावी दुष्कर्मी मिलाकर?
यानी जो ऐसे कुत्सित षड्यंत्र में रुझान रखते हैं उन सब को मिलाकर।
कितने होंगे?
हजार। दस हजार। एक लाख?
कितने?
पुलिस वाले‌?
काेई 21 लाख। कहीं 25 लाख भी लिखा है।
और हम?
सवा सौ करोड़।
चींटी से भी कम आकार के अपराधियों से डर रहे हैं। शर्म से गड़ रहे हैं। नैतिक रूप से मर रहे हैं। चीख तो हमारी, हमने ही घोंट रखी है।
क्या मजाल कि भारतवर्ष के नागरिक हम गर्जना कर दें कि - अब नहीं।
कोई ऐसा पाप नहीं कर सकेगा। तो कौन कर पाएगा?
ऐसा संकल्प असंभव है। किन्तु लेना ही होगा।
कोख से पैदा हुए हैं। नारी के उऋण कभी नहीं हो सकते। किन्तु धर्म तो निभा सकते हैं।
धर्म यानी कर्तव्य। धर्म यानी कर्म।
धर्म यानी समानता।
धर्म अर्थात् आप।
- (लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)