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महिला ने अकेले की 32 हजार किमी कार यात्रा

मध्य एशिया के देशों में भारतीय होने के कारण मिले सम्मान से गर्व की अनूठी अनुभूति।

Dainik Bhaskar

Dec 12, 2016, 04:26 AM IST
Bhaskar Column
मेरी परवरिश ज्यादातर लंदन में ही हुई है और वहीं कार चलाना सिखा। जब कभी मन उदास होता या फिर दिल में कोई उलझन होती, तो मैं ऊंची आवाज में म्यूजि़क लगाकर लंबी कार ड्राइविंग पर जाती थी। कहीं नदी या हरियाली दिख जाए, तो वहां कार पार्क कर पैदल चलती थी। इस तरह कार चलाना कब मेरा पैशन बन गया पता नहीं चला।

32 हजार किलोमीटर की यात्रा के दौरान दर्जनों नई संस्कृतियों से परिचय हुआ। मुझे चीन के रोड बहुत अच्छे लगे, लेकिन मैं वहां रहना पसंद नहीं करूंगी, क्योंकि मुझे वहां की बाकी चीजें अच्छी नहीं लगीं। कोई मुझे पूछे कि धरती पर स्वर्ग कहां है, तो मैं हमेशा नार्वे का नाम लूंगी। वहां गर्मियों में अद्‌भुत प्राकृतिक सौंदर्य रहता है, लेकिन ठंड इतनी जबरदस्त है कि मैं वहां रह नहीं सकती। रहने के लिए तो लंदन भी परफेक्ट नहीं लगा और यहां तक कि भारत भी नहीं। मैंने जिस दिन मोरे चेकपोस्ट से दोपहर को भारत में प्रवेश किया वह 8 नवंबर का दिन था। इम्फाल आते-आते शाम हो गई और नोटबंदी की घोषणा हो रही थी। तब मेरे पास पानी की एक बोतल लेने तक के पैसे नहीं थे। हालांकि, अन्य देशों की थोड़ी-थोड़ी करेंसी जरूर थी। परिचय न होने के बावजूद लोगों ने बहुत मदद की। ऐसा भाईचारा पश्चिमी देशों में बिल्कुल देखने को नहीं मिलता है। वहां यदि कोई मरा पड़ा है तो भी कोई देखने वाला नहीं होता। भारत में कई जगहों पर लोगों ने मेरा कार्ड स्वाइप कर दो-दो हजार रुपए दिए। इतनी लंबी यात्रा थी तो जाहिर है मुश्किलें भी आई और खट्‌टे-मीठे अनुभव भी आए। रूस से गुजरते वक्त एक पेट्रोल पम्प पर मेरी डीज़ल कार में पेट्रोल डाल दिया गया, क्योंकि वहां लोगों को इंग्लिश शायद बिल्कुल समझ में नहीं आती। दूसरे दिन मेरा वीजा़ खत्म हो रहा था इसलिए मुझे बोर्डर क्रॉस करनी थी। वीज़ा खत्म हो जाता, तो दूसरे एक्सटेंशन के लिए कुछ दिन लग जाते। फिर चीन, डेनमार्क आदि देशों की वीज़ा अवधि खत्म हो जाती। बॉर्डर करीब 66 किलोमीटर दूर थी और वह सिर्फ दिन में ही खुली रहती है। मैं तो एकदम परेशानी में आ गई, क्योंकि कार को टोइंग करके गैरेज में लाकर फ्यूल टैंक खाली करने के साथ फिल्टर बदलना था। उसके बाद ही डीज़ल डाला जा सकता था। इस सबमें मेरे पांच-छह घंटे लग गए। मुझे इंग्लिश के एक प्रोफेसर मिले, जो रशियन भी बोल सकते थे। वे तब तक रुके रहे, जब तक मेरी समस्या दूर नहीं हुई। मुझे लगा हम एशियाई देशों में लगाव और भाईचारा है। रूस के अलावा कजाकिस्तान और किर्गिजस्तान जैसे एशियाई देशों में मेरा अच्छा अनुभव रहा। एशिया और यूरोप के बीच मुझे मेहमाननवाजी में बहुत बड़ा फर्क देखने को मिला।

कजाकिस्तान में मुझे बहुत बुरा अनुभव भी आया। मेरी बीएमडब्ल्यू कार ब्रिटिश नंबर की थी,तो पुलिस ने रोका। मैंने ब्रिटिश पासपोर्ट दिखाया तो उन्होंने लुटेरों की तरह रिश्वत में 250 अमेरिकी डॉलर लिए। पर आगे रास्ते में उसी दिन जब मुझे दोबारा रोका गया, तो मैंने ओसीआई (ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया) पासपोर्ट दिखाया, तो मुझे सम्मान से जाने दिया गया। मेरी यात्रा में आए मध्य एशिया के तीनों देशों में मुझे भारतीय होने की वजह से बहुत सम्मान मिला। इससे मुझे भी भारतीय होने पर गर्व की अनुभूति हुई। रूस और कजाकिस्तान की सीमा पर दोनों देश के सैनिक एक-दूसरे से वाकी-टॉकी पर मेरे इंडियन होने का जिक्र कर रहे थे। मुझे लाइन में नहीं खड़ा होना पड़ा और पासपोर्ट भी जल्दी मिल गया। दो घंटे की बोर्डर क्रॉसिंग में महज दस मिनट लगे। रूस, कजाकिस्तान, किर्गिजस्तान और यहां तक कि चीन में भी लोग भारतीय अभिनेताओं को बहुत ज्यादा पसंद करते हैं। म्यांमार में तो वहां के राष्ट्रपति के आदेश से बहुत से लोगों ने मेरे फोटो खींचे ताकि वहां के पर्यटन को प्रोत्साहन दिया जा सके। वे यह रेखांकित करना चाहते थे कि एक भारतीय महिला हमारे देश में पूरी तरह सुरक्षित अकेले ड्राइव कर रही है।

किर्गिजस्तान से चीन की सीमा पार करते वक्त आधे एवरेस्ट की ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं। यह दुनिया का सबसे मुश्किल व खतरनाक बॉर्डर क्रॉसिंग मानी जाती है। ऊंचाई समुद्र की सतह से 12 से 13 हजार वर्गफीट रही होगी। मैंने इतनी ऊंचाई पर करीब 500 किलोमीटर तक कार चलाई होगी। उस दिन बर्फ गिरने से मुश्किल और बढ़ गई। नितांत अकेलेपन की यात्रा के दौरान मैंने अनुभव किया कि मुझे अस्पताल से बहुत डर लगता है, जबकि मेरी शादी डॉक्टर से हुई है। शायद इसलिए कि मैंने अपने नानाजी को आखिरी दिनों में अस्पताल में देखा था और वे लौटकर कभी नहीं आए। इस तरह अपने भीतर की चीजों को मैंने अकेलेपन के दौरान महसूस किया। मैंने कभी भी खुद पर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाली पहली महिला या इस प्रकार की बातों को हावी नहीं होने दिया। मैंने हमेशा यही सोचा कि वुमन एम्पावरमेंट और ‘बेटी बचाओ..’ का संदेश देना मेरी नैतिक जिम्मेदारी है। यह इसलिए भी था, क्योंकि मेरे जीवन की शुरुआत में मुझे भी लड़की होने की वजह से नीचा दिखाने की कोशिश की गई। भारतीय पेट्रोलियम में काम करने वाले पिता के देहांत होने के बात मेरे चाचा ने हम दो बहनों की जिम्मेदारी लेने से इनकार करते हुए कहा,‘लड़कियों और रास्ते में पड़े पत्थर के बीच कोई फर्क नहीं होता है।’ नानाजी ने ही हमें प्रोत्साहन दिया, आगे बढ़ाया। मैं उनकी याद में नवसारी (गुजरात) और अपने ससुराल म्हाड (महाराष्ट्र) दोनों स्थानों पर एक अस्पताल बनाना चाहती हूं, क्योंकि मैंने नानाजी को अस्पताल में अच्छे डॉक्टर न होने और उसमें अत्याधुनिक साधन नहीं होने की वजह से खोया था। मेरे पति डाॅक्टर हैं, इसलिए मुझे यह मुश्किल नहीं लगता। चूंकि मेरे पति ने म्हाडा के स्कूल में मराठी मीडियम से पढ़ाई की थी, इसलिए हम वहां भी अस्पताल खोलना चाहते हैं।

32 हजार किलोमीटर की अकेली कार यात्रा से मुझे यह लगा कि लड़का हो या लड़की कुछ भी असंभव नहीं है। पूरे समर्पण भाव व लगन और कड़ी मेहनत से कोई भी काम किया जाए तो वह मुश्किल होने के बावजूद पूरा किया जा सकता है। मुश्किलें और समस्याएं सिर्फ भारत में ही नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया में हैं। पर जिस तरह से भारत में मुश्किलों को उछाला जाता है, वैसा दूसरे देशों में कम होता है
(जैसा उन्होंने मुंबई में विनोद यादव को बताया)
भारूलता कांबले
2,792 किमी का आर्कटिक सर्कल पूरा करने वाली पहली महिला bharulata211@yahoo.com
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