इन दिनों इतिहास बड़ी चर्चा में है। बिल्कुल अभी 20वीं सदी में घटे इतिहास से लेकर कई-कई सदी पहले तक का इतिहास इस चर्चा के दायरे में है। यह चर्चा कुछ निंदाओं और कुछ गौरव-कथनों के आस-पास घूमती है। कभी अकादमिक संस्थाओं के इतिहासकारों को कोसा जाता है तो कभी कुछ ऐसी दंतकथाएं इतिहास की पुड़िया में बांधकर लोगों की जुबानों पर छोड़ दी जाती हैं, जो समाज की इतिहास चेतना को भ्रष्ट करती हैं।
हम एक पुरातन देश हैं। हमारे पास समय की गहनतम चेतना और जीवन का बड़ा ही बारीक बोध है। यह हमारी सभ्यता को एक मजबूत आधार देता है। उसे सदियों की उठा-पटक के बीच भी टिकाए रखता है। पर कहानी यहीं खत्म नहीं हो जानी चाहिए। सिर्फ टिके रहना जीवन नहीं है। हमें एक आधुनिक और वैचारिक-सांस्कृतिक रूप से आत्मनिर्भर देश भी होना चाहिए, जो हम नहीं हैं। आधुनिकता के नाम पर हम औपनिवेशिक पश्चिमीकरण के शिकार हैं और संस्कृति के नाम पर अपनी रूढ़ियों के पोषक। हमें ऐसी आधुनिकता चाहिए, जिसके पास इतिहास का आधुनिक बोध और उसकी वास्तविक चेतना भी हो।
बेशक, इतिहास के नाम पर गप्पबाजी की माउथ पब्लिसिटी देश के रूप में हमें हीन ही बनाएगी। उदाहरण से बात साफ होगी। एक शब्द है -आक्रांता। इस शब्द के साथ मध्य युग के पूरे भारतीय इतिहास को नत्थी कर आत्मसंतोष का एक आख्यान गढ़ लिया जाता है कि हमारे महान देश को आक्रांताओं ने पददलित कर दिया। मध्य एशिया से कुछ सौ या कुछ हजार हमलावर टुकड़ियों में आते रहे और हिंदुस्तान की लाखों की संख्या वाली विशाल सेनाओं को धूल की तरह उड़ाते हुए सत्ता पर काबिज हुए।
सही इतिहास-चेतना इतिहास के इस तथ्य से क्या निष्कर्ष निकालेगी? आक्रांता इसलिए सफल नहीं हुए कि वे बर्बर थे और हम शांतिप्रिय। फिर पराजय के लिए दिल्लीधीशों की लाखों की सेना कहां से आती थी? देशभर में आंतरिक युद्धों के सिलसिले किसी भी तरह इस शांतिप्रियता की गवाही तो नहीं देते। बात यह थी कि भारत की अंतरात्मा जर्जर हो चुकी थी, वह अपना ज्ञान, विज्ञान, युद्धकौशल, दर्शन सब कुछ खोकर मिथ्या गर्वों के आत्महंता कगारों पर खड़ी थी। आक्रांताओं ने उसे सिर्फ धक्का दिया। यदि हममें सही इतिहास-चेतना जन्मेगी तो हम खलनायक नहीं तलाशेंगे। आत्म-निरीक्षण करेंगे और जानेंगे कि एक देश और समाज के रूप में हम आज भी अपने ही मध्ययुग की जर्जर अंतरात्मा वाले लोग हैं और इसीलिए पश्चिमी साम्राज्यवाद के शिकार हैं।
हमें यह सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं होती कि संसार की सबसे पुरानी सभ्यता, सबसे महान संस्कृति को घुन न लगा होता, तो आधुनिक संसार की सारी उपलब्धियां भारत के खाते में होतीं। हम आधुनिकता के दयनीय अनुकरणकर्ता नहीं, आधुनिकता के सर्जक होते। हमें सचमुच सही इतिहास और वास्तविक इतिहास चेतना चाहिए, पर किसी पार्टी के एजेंडे और किसी संगठन के ऐतिहासिक हीन-भाव से उपजी दंतकथाएं और घर-घर घूमती इतिहास की गप्पबाजी नहीं।
लेखक ‘अहा! जिंदगी ’ मैग्जीन के संपादक हैं।
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