प्रधानमंत्री ने देश की सफाई की जबर्दस्त घोषणा कर सरकार की मंशा स्पष्ट कर दी थी, लेकिन यह चूक अवश्य हुई कि कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई गई है, इसलिए मुिहम का कोई असर नहीं दिखाई देता। अन्य देशों से हमने सबकुछ सीखा पर साफ-सफाई की उनकी समझ नहीं आई। पश्चिमी सभ्यता को इस देश ने भोजन, भाषा और वेशभूषा में पूरी तरह अपनाया है। फैशन जगत से लेकर पिज्जा हट व मैकडॉनल्ड या फिर जींस में हमने शीघ्र बराबरी कर ली और जो बच गया है उसके लिए भी आतुर हैं पर पश्चिम के लोग सफाई के प्रति कितने सजग हैं, वह नहीं सीख पाएं। वहां साफ-सफाई किसी नियम या एक्ट की मोहताज नहीं है। इसे वहां नैतिक दायित्व समझा जाता है। इसे अन्य किसी सफेदपोश काम की तरह देखा जाता है। ऐसे काम में लगे लोगों को न हीन समझा जाता है और न कोई परहेज किया जाता है।
असल में भारत में स्वच्छता अभियान सफाई-दूतों (कर्मचारियों) पर केंद्रित होना चाहिए। अब अमेरिका में सफाई कर्मचारी को एक से डेढ़ लाख रुपए मिल जाते हैं और वह भी अन्य नागरिकों के आर्थिक वर्ग में शामिल होता है। शाम को किसी पार्टी में वह अन्यों की बराबरी करता दिखता है। हमारे देश में यह काम या तो मजबूरी है या फिर किसी खास वर्ग का दायित्व। सरकार स्वच्छता के बारे में गंभीर है तो इस वर्ग की चिंता करें। पश्चिमी देशों में हर तरह के कूड़े का सदुपयोग किया जाता है। वहां कूड़े का उपयोग ऊर्जा, खाद आदि के निर्माण में किया जाता है। कचरा निस्तारण अच्छा रोजगार है और जीडीपी का हिस्सा है।
यह भी अच्छी तरह समझना होगा कि जब तक कूड़े-कचरे से मजबूत आर्थिकी नहीं जुड़ेगी तब तक यह सड़कों पर पड़ा ही दिखेगा। एक बार यह अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन जाए तो सिरे से ही गायब नहीं हो जाएगा, बल्कि घर-घर से उठ जाने की व्यवस्था अपने-आप हो जाएगी। हर घर खुद ही इसे संभालकर रखेगा जब तक कि उसका उचित दाम नहीं मिल जाता। अब देखिए, घरों से अखबार व खाली बोतलें प्राय: नहीं फेंके जाते, क्योंकि उनका कुछ दाम परिवारों को मिल ही जाता है। देश के बड़े शोध संस्थानों को इसी काम में झोंक देने की आवश्यकता है। ये यह शोध कर तय करें कि किस कचरे का क्या संभावित उपयोग हो सकता है।
ऐसे शोध हैं भी पर वे संस्थानों से बाहर नहीं निकल पाए। इसके साथ ही सरकार को अन्य उद्योगों की सब्सिडी हटाकर कचरे पर आधारित उद्योग को बढ़ावा देना चाहिए। सफाई तो होगी ही और साथ में नए रोजगार का सृजन होगा। फिर अपार कूड़ा-कचरा अगर कीमत में बदल दिया गया तो उसके घर से सड़क पर आने का प्रश्न ही खड़ा नहीं हो सकता, क्योंकि यह भी सत्य है कि जो बिना मोल है वही सड़क पर है, जिसका मोल होता है उसे सजाया संभाला जाता है। सार यह है कि सफाई-कर्मचारियों की आर्थिक हैसियत बढ़ाई जाए और कचरे को आर्थिक महत्व मिले।
लेखक ख्यात पर्यावरणविद व हेस्को के संस्थापक हैं।
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