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टेक्नोलॉजी से मिलेगी महिलाओं को सुरक्षा

7 वर्ष पहले
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रात को देर हो गई थी और मेरी सहेली की बेटी टैक्सी से घर जाने पर विचार कर रही थी। हफ्तेभर पहले यह कोई बहस का विषय नहीं होता था। हालांकि, उबर कैब में हुई ताजा वारदात के बाद मुझे दो बार सोचना पड़ा। अाखिर मैंने अपने घर के ड्राइवर को नींद से जगाकर कहा कि वह इस लड़की को उसके घर छोड़ आए। दिल्ली जैसे शहर में, जहां हजारों पर्यटक आते हैं और कामकाजी महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है, वहां ऐसी टैक्सियां होना बर्दाश्त के बाहर है, जिनमें महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। टैक्सी सेवा पर प्रतिबंध लगाना सबक सिखाने के लिए तो ठीक है पर यह कोई समाधान नहीं है। सुरक्षा के कुछ ऐसे उपाय है, जिन्हें आजमाया जा सकता है। जीपीएस ट्रैकिंग डिवाइस लगाकर टैक्सी पर निगरानी रखी जा सकती है। ग्राउंड स्टाफ पर भी नजर रखी जा सकती है और पूरी सेवा का सुचारू संचालन किया जा सकता है।

इसके बाद इन सेवाओं को चाहिए कि अपने टैक्सी ड्राइवरों की पृष्ठभूमि की अच्छी तरह जांच करें। अभी टैक्सी को एप से बुक किया जाता है। यानी ड्राइवर पर निगाह रखने के लिए कोई ग्राउंड स्टाफ नहीं होता। अब यह भी कदम उठाया गया है कि यदि कोई टैक्सी सेवा पंजीकृत नहीं है तो उसे अवैध माना जाएगा। यदि यह कदम पहले ही उठा लिया गया होता तो कईं वारदातें न हो पातीं। हमारा रवैया ऐसा है कि हम वारदातों की रोकथाम का उपाय नहीं करते बल्कि वारदात हो जाने पर प्रतिक्रिया में कदम उठाते हैं।
ऐसी घटनाएं होने के बाद एक तबका आरोपियों की हताशाजनक स्थितियों की चर्चा करने लगता है। दो साल पहले दिल्ली बस की घटना के बाद कहा गया कि राम सिंह व उसके भाई को दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था, लेकिन हाल की घटना के आरोपी शिवकुमार यादव का काम अच्छा चल रहा था। मथुरा में वह पत्नी, दो बेटियों और गोद लिए बेटे के साथ रहता है। यहां कौन सी दलील दी जा सकती है? मैं ऐसी दलीलों से तंग आ गई हूं कि कोई अपनी हताशा को किसी महिला पर निकालने को उचित समझे।
हमें वास्तविकता स्वीकार करनी होगी, फिर दुराचारी चाहे जिस वर्ग, जाति या धर्म का ही क्यों न हो। उसे तो कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए। निश्चित ही उसे सड़कों पर खुला नहीं छोड़ा जा सकता। अब समय अा गया है कि कुछ कड़े कानून लाए जाएं। महिलाओं के लिए विशेष सुरक्षा बंदोबस्त किए जाएं। फिर चाहे वह दिन की बात हो या रात का समय। नेताओं को यह समझ लेना चाहिए कि महिलाएं बड़ी संख्या में घर के बाहर काम करने लगी हैं। अपने टैक्स चुका रही हैं।
अपने दम पर पूरे परिवार को पाल रही हैं। ऐसे में शहर उनके लिए सुरक्षित क्यों नहीं होना चाहिए? हमें जिस बात की जरूरत है, वह है क्रांति। ऐसी क्रांति, जिसमें लोग ऐसे अपराधों को गंभीरता से लें न कि ‘अस्थायी प्रतिबंध’ लायक समझें। संभव है यदि हर महिला हड़ताल पर चली जाए-घर में खाना न पकाए, दफ्तर में काम न करे, स्कूल से बच्चों को न लाए तो शायद व्यवस्था किसी बदलाव पर मजबूर हो।
लेखिका एआईसीसी सदस्य हैं।
archanadalmia@gmail.com