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बिहार में चलती सत्ता की नौटंकी

6 वर्ष पहले
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बिहार में नीतीश कुमार को फिर विधायक दल का नेता चुन लिया गया है। हालांकि, वे जीतन राम मांझी अभी भी मुख्यमंत्री हैं, जिन्हें यह सोचकर सत्ता सौंपी गई थी कि असली कमान नीतीश कुमार के हाथों में होगी। जब मांझी सत्ता मजबूत करने में लगे तो उनकी मुश्किलें बढ़ गईं।

सियासी नाटक के बाद नीतीश कुमार एक बार फिर विधायक दल के नेता चुने गए। यह बिहार की सत्ता की कमान एक बार फिर उनके हाथों में सौंपने की कवायद है। यह संवैधानिक मामला है कि जीतन राम मांझी के मुख्यमंत्री रहते विधायक दल का नेता चुना जाना कितना वैध है? किंतु इतना तय है कि मांझी को बेआबरू कर कुचे से बाहर करने का सियासी नाटक रचा गया। मांझी ने ठीक कहा है कि नीतीश कुमार सत्ता के बगैर नहीं रह सकते। उसके लिए समय-समय पर वे सिद्धांतों को तिलांजलि भी देते रहे हैं। 2000 में जब एनडीए की महज सात दिन में सरकार गिर गई तो उन्होंने कहा था कि वे अब बिहार छोड़कर नहीं जाएंगें, लेकिन ठीक उसके बाद वे बोरिया-बिस्तर समेटकर दिल्ली पहुंच गए और वाजपेयी कैबिनेट में रेल मंत्री बन गए। 1997 में लालू प्रसाद से अलग होने पर उन्होंने कहा था कि लालू के जंगल राज से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने भाजपा का दामन थामा है, लेकिन यही भाजपा नरेंद्र मोदी के उभार के बाद उन्हें सांप्रदायिक लगने लगी।
जिस गोधरा प्रकरण की आड़ में वे मोदी से किनारा करने लगे, उस प्रकरण के समय वे रेल मंत्री थे। तब उन्होंने पद से इस्तीफा नहीं दिया था। मई 2014 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने इस्तीफा देकर अवाम में यह संदेश देने की कोशिश की कि उन्हें सत्ता का जरा भी मोह नहीं है। नीतीश ने यह सोचकर मांझी को मुख्यमंत्री बनाया कि कमान उनके हाथ में होगी। यह स्पष्ट था कि नवंबर में आने वाले चुनाव तक बने रहने की व्यवस्था मात्र की गई है, लेकिन दो-तीन महीने बीतते न बीतते हर दिन दोनों खेमों से बयानबाजी होने लगी। नीतीश कुमार के इशारे पर मंत्रियों द्वारा मुख्यमंत्री को बेइज्जत किया जाना और बार-बार नीतीश के अलावा शरद यादव द्वारा उन्हें बुलाकर चेतावनी देना मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद को अपमानित करना नहीं तो और क्या है?
मांझी के दो मंत्रियों द्वारा मुख्य सचिव से यह जवाब तलब किया गया कि मुख्यमंत्री ने फलां अधिकारियों का तबादला कैसे कर दिया? एक प्रवक्ता मुख्यमंत्री को सुशासन को समझने की नसीहत दे रहा है। मांझी ने ठीक ही कहा कि हर रोज़ उनका चीरहरण हो रहा है और नीतीश कुमार भीष्म पितामह की तरह चुप्पी साधे बैठे हैं। हां, मांझी की भी कुछ गलतियां रही हैं। उन्होंने दलित अधिकारियों के साथ गुपचुप बैठकें कीं। डॉक्टरों के हाथ काट लेने व केंद्रीय मंत्रियों को बिहार में न घुसने की धमकी जैसे उलजलूल बयान दिए। अब सरकार बनाने के लिए आमंत्रण मिलने में देरी का अंदेशा होने के कारण नीतीश ने राष्ट्रपति के यहां गुहार लगाई है। उनके साथ उन्हें समर्थन दे रहे 130 विधायक भी होंगे। जाहिर है सत्ता में लौटने के लिए नीतीश कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते।

लेखक पटना स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।
nilanshuranjan@gmail.com