नेपाल दक्षिण एशिया सहयोग संगठन (सार्क) के शिखर सम्मेलन के दौरान
नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ ने एक-दूसरे के प्रति ठंडा रुख दर्शाया होगा, लेकिन दोनों प्रधानमंत्रियों का यह रवैया सीमा के दोनों ओर रह रहे आम लोगों की मनोवृत्ति को व्यक्त नहीं करता। भारत और पाकिस्तान के लोगों के बीच रिश्तों में उससे कहीं ज्यादा गर्मजोशी प्रतीत होती हैं, जितनी आमतौर पर अपेक्षा की जाती है। न सिर्फ सीएसडीएस की ओर से कराए सर्वेक्षण के आंकड़े इसका समर्थन करते हैं बल्कि पिछले कुछ महीने में मेरी दो पाकिस्तान यात्राओं में सर्वेक्षण में सामने आई बातों की पुष्टि हुई।
सर्वेक्षण में सामने आईं बातों से पता चलता है कि 47 फीसदी भारतीय इस बात से सहमत हैं कि भारत और पाकिस्तान के आम लोग दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध चाहते हैं, लेकिन ये तो दोनों ओर की सरकारें हैं, जो शत्रुता को बढ़ावा देती हैं। जाहिर है कि इस दृष्टिकोण से भारतीय बड़ी संख्या में सहमत हैं, लेकिन सारे भारतीयों का यह मत नहीं है। 20 फीसदी ने इससे असहमति जताई है। सर्वेक्षण से यह भी पता चला है कि 45 फीसदी भारतीय पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ने के खिलाफ हैं। हालांकि, 28 फीसदी युद्ध का समर्थन करते हैं। वे इसके पक्ष में नजर आए।
मजे की बात यह है कि 27 फीसदी भारतीय ऐसे भी हैं, जो इस मुदद्े पर कोई राय नहीं जता पाए यानी इस मुद्दे पर उनका कुछ कहना नहीं है। टेलीविजन की वार्ताओं पर चाहें हम गरमा-गरम बहसों के दौरान पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ने के पक्ष में मजबूती से राय व्यक्त होते देखते होंगे, लेकिन ऐसे भारतीयों की अच्छी-खासी संख्या है, जो सीमा पार से जारी आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया जारी रखना चाहते हैं। वे इस पड़ोसी देश के खिलाफ युद्ध छेड़ना नहीं चाहते।
इस मुद्दे पर सीमा के उस पार (पाकिस्तान में) भावनाएं कोई बहुत ज्यादा अलग नहीं हैं। मेरी हाल ही की यात्राओं के दौरान मुझे लाहौर और इस्लामाबाद में लोगों से बात करने का मौका मिला। इस दौरान मुझे भी उक्त अहसास हुआ। यह पांच वर्ष पहले कराए सर्वेक्षण के नतीजों से थोड़ा भी अलग नहीं था। पाकिस्तान के आम लोगों में हमेशा भारत के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की ललक दिखाई दी है। उतनी ही तीव्र इच्छा भारत यात्रा पर जाने की भी नजर आती है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने नरेंद्र मोदी के निमंत्रण को स्वीकार कर भारतीय प्रधानमंत्री के शपथ समारोह में भाग लिया था जबकि पिछली बार इसी प्रकार का शरीफ का निमंत्रण तब के भारतीय प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह ने ठुकरा दिया था। मोदी के शपथ समारोह में नवाज शरीफ के आने और दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच द्विपक्षीय बातचीत ने भारत-पाक रिश्तों में सुधार की उम्मीद बढ़ा दी थी, लेकिन नेपाल में सार्क के शिखर सम्मेलन में जब दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की उपेक्षा करने की कोशिश की तो शरीफ की भारत यात्रा से पैदा हुआ उत्साह और दोनों देशों के बीच रिश्तों में नई शुरुआत की उम्मीद कुछ धूमिल पड़ गई।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि भारत की मौजूदा सरकार किस तरह की विदेश नीति अपनाना चाहती है। खासतौर पर पाकिस्तान के संबंध में। किस बात ने नरेंद्र मोदी को अपने शपथ समारोह में सारे दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्र प्रमुखों को आमंत्रित करने के लिए प्रेरित किया था? इससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि नई सरकार किस तरह की विदेश नीति पर चलने का इरादा रखती है? मोदी सरकार पड़ोसियों से किस तरह से व्यवहार करना चाहती है और दुनिया की शक्तियों से व्यवहार में किस तरह का रुख रखा जाएगा? प्रधानमंत्री बनने के बाद थोड़े ही समय में इतने सारे देशों की यात्राएं करने के पीछे प्रधानमंत्री का उद्देश्य क्या है? ऐसा करने के पीछे उनकी प्रेरणा क्या है?
सार्क देशों के सारे राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित कर हमारे प्रधानमंत्री ने भारत के इतिहास में नया अध्याय तो खोला और सभी ने इसे सकारात्मक प्रतिसाद भी दिया पर उससे आगे कोई प्रगति होती नजर नहीं आई है। सार्क राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करने के अलावा मोदी ने दुनिया में उभरती शक्ति चीन के राष्ट्रपति की भी मेजबानी की। वे भूटान, नेपाल और म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों की यात्रा पर तो गए ही, उन्होंने अमेिरका, ऑस्ट्रेलिया या जापान जैसे शक्तिशाली देशों की यात्राएं भी कीं। हालांकि, इस वक्त यह स्पष्ट नहीं है कि मोदी की इन यात्राओं से भारत को क्या मिला?
नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्राओं के दौरान लगभग 30 दिनों तक देश से बाहर रहे। शायद ही ऐसा कोई प्रधानमंत्री रहा हो, जिसने पद ग्रहण करने के बाद इतनी जल्दी इतनी विदेश यात्राएं की होंगी। यह सही है कि पड़ोसी देशों के साथ समझौते हुए और भारत में निवेश के वादे भी किए गए, लेकिन चीजों को अभी औपचारिक स्वरूप ग्रहण करना है। भूटान में बिजली उत्पादन का समझौता हुआ तो नेपाल में काठमांडू व दिल्ली के बीच बस सेवा को झंडी दिखाई गई और परस्पर सहयोग से ट्रामा सेंटर खोला गया। म्यांमार में मोदी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी की नेता आंग सान सूकी से मिले।
इस वक्त तो यह समझना कठिन है कि देश को इन यात्राओं व समझौतों से कितना फायदा होगा। आर्थिक फायदा हासिल करने से भी अधिक ये यात्राएं और विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को भेजे आमंत्रण छवि निर्माण की सुनियोजित कवायद लगती है। इन देशों के बीच अपनी वैधता स्थापित करने की ओर बढ़ाया गया कदम है, जिन्होंने 2002 में गुजरात में घटी घटनाओं के बाद उनसे दूरी बना ली थी। उन घटनाअों के बाद मोदी को अपनी ही देश के बड़े तबके में अपनी वैधता स्थापित करने में बरसों लग गए। अब जब उन्होंने इस बड़े तबके का दिल जीत लिया है, तो वे एेसी ही मान्यता पड़ोसी देशों और दुनिया के ताकतवर देशों के बीच हासिल करने में लगे हैं। ओबामा द्वारा अगले वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह का मुख्य अतिथि बनने का उनका निमंत्रण स्वीकार करने के बाद वे अपनी वैधता स्थापित करने में सफल होते प्रतीत हुए हैं।
मुझे पता है कि पाकिस्तान का मुद्दा जरा अलग है। दोनों देशों (सरकारों) के बीच कुछ विवादास्पद मुद्दे हैं, लेकिन इनका संबंध मोटेतौर पर उन लोगों से है, जो सत्ता में बैठे हैं। आम लोगों के स्तर पर मित्रतापूर्ण रिश्तों की आकांक्षा है। क्या लोकतंत्र का मतलब लोगों की इच्छा अथवा राय को सम्मान देना नहीं है? क्या मोदी सरकार पाकिस्तान के साथ अधिक मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए अपनी ओर से कुछ अतिरिक्त कदम उठाने की इच्छुक नहीं है? भारत का बड़ा तबका युद्ध नहीं, यही चाहता है।
संजय कुमार
डायरेक्टर, सेंटर फॉर स्टडी
ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज
sanjay@csds.in