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न्याय प्रणाली की धीमी रफ्तार

7 वर्ष पहले
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भारतीय न्यायिक व्यवस्था की सुस्त चाल के सामने नौ दिन चले अढ़ाई कोस जैसी पुरानी कहावतों को नए सिरे से गढ़ने की जरूरत है। पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या के मुकदमे का फैसला आने में 40 वर्ष लग गए। अभी जिला अदालत ने निर्णय सुनाया है। हत्या के दोषी चार आरोपी ऊंची अदालत में अपील करेंगे। जाहिर है, अंतिम फैसला आने में कुछ और वर्ष लग सकते हैं। यह स्थिति तब है, जब मामला पूर्व केंद्रीय मंत्री का है। फिर सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में मामले की धीमी सुनवाई पर नाराजगी जताई थी। जब हाई प्रोफाइल मामले की यह स्थिति है तब सामान्य लोगों के मुकदमों की कल्पना की जा सकती है। जमीन–जायदाद से संबंधित सिविल मामलों का अंतिम निर्णय होने में 25-30 वर्ष लगना सामान्य बात मानी जाती है। लंबे समय से पेंडिंग मुकदमे न्यायिक प्रणाली की पहचान बन गए हैं। इस समय देश की अदालतों में तीन करोड़ से अधिक मुकदमे पेंडिंग हैं। सुप्रीम कोर्ट में 64,919, उच्च न्यायालयों में 44.5 लाख और निचली अदालतों में दो करोड़ 60 लाख मुकदमे चल रहे हैं।
मुकदमों के निपटारे की धीमी गति पर सरकार और न्यायिक हलकों में वर्षों से विचार जारी है। विधि आयोग अपनी कई रिपोर्टों में अदालतों के कामकाज को तेजी से निपटाने के बारे में सुझाव दे चुका है। आयोग की सिफारिशों पर अमल के प्रभावी तरीके में सरकारों की दिलचस्पी नहीं है। मुकदमों के लटकने के कई कारण हैं। उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में बड़ी संख्या में न्यायाधीशों के पद खाली हैं। देश के 24 हाईकोर्ट में न्यायाधीशों के 35 फीसदी पद खाली हैं। कई बार सरकारों के स्तर पर जजों के खाली पद भरने में देर होती है। खाली पदों के अलावा अदालतों की कार्य संस्कृति भी मुकदमों के बढ़ते बोझ के लिए जिम्मेदार है। अदालतों में गर्मियों की लंबी छुटि्टयों की व्यवस्था पर गौर करने की जरूरत है। वकीलों का टालू रवैया भी मुकदमों की स्वाभाविक गति में बाधा डालता है। कई बार वकीलों और उनके क्लाइंट की दिलचस्पी मुकदमे की तारीखें बढ़वाने में रहती है। सरकार और न्यायिक तंत्र को इन सभी पहलुओं पर गौर कर मुकदमों के तेजी से निपटारे का कोई रास्ता खोजना होगा। ‘न्याय में देर न्याय न होने के समान है’ इस कहावत पर संबंधित लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।