बीमा नियमावली (संशोधन) विधेयक पर चंदन मित्रा की अध्यक्षता वाली प्रवर समिति की रिपोर्ट बुधवार को राज्यसभा में पेश की गई तो आर्थिक सुधारों से संबंधित इस महत्वपूर्ण कदम पर 7 साल लंबा इंतजार खत्म हुआ। हालांकि, सर्व-सम्मति अब भी नहीं है, लेकिन मुख्य प्रावधानों पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच आमराय बनने से यह आशा प्रबल हुई है कि आखिरकार इस विधेयक को पारित कराना संभव हो जाएगा। मकसद बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर 49 फीसदी करना है (अभी यह 26 प्रतिशत है)। कंपनियां भारतीय स्वामित्व में ही रहें, इसके लिए बीमा कानून में (कंपनी पर) ‘नियंत्रण’ की नई परिभाषा शामिल की जाएगी। साथ ही नियम तय करने के इरडा (बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण) के अधिकारों में संशोधन होगा। उम्मीद है कि इससे बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश भारत आएगा, जिससे बीमा कंपनियां अपनी सेवाओं का दायरा बढ़ा सकेंगी और देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी समृद्ध होगा।
फिर इससे यह महत्वपूर्ण संदेश पूरी दुनिया में जाएगा कि राज्यसभा में बहुमत न होने के बावजूद वर्तमान केंद्र सरकार आर्थिक सुधारों से संबंधित विधायी प्रक्रियाओं को अंजाम तक पहुंचाने में सक्षम है। कांग्रेस को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि आर्थिक सुधारों के मुद्दे पर वह संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित नहीं हुई है। वह इस बात से नहीं मुकरी कि बीमा कानून में संशोधन की पहल दरअसल उसके नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने ही की थी। भारतीय राजनीति में, जहां सत्ता और विपक्ष में जाते ही पार्टियां अपना रुख बदल लेती हैं, यह बड़ी बात है। दरअसल, कांग्रेस ने श्रम सुधारों से संबंधित कानून पर भी सकारात्मक रुख अपनाया था। बहरहाल, अब बीमा बिल संसद के दायरे में है। इससे संबंधित दो चिंताएं अभी बाकी हैं। पहली विदेशी संस्थागत निवेशकों को भी निवेश की अनुमति दिए जाने से संबंधित है। दूसरी चिंता इसको लेकर है कि नियमों में प्रस्तावित बदलाव से बीमा कंपनियों को ग्राहकों के दावों को ठुकराने के ज्यादा अवसर मिल जाएंगे। संसद में चर्चा के दौरान सरकार को इन मुद्दों पर देश को भरोसे में लेना चाहिए। लोगों में यह विश्वास पैदा करना बेहद जरूरी है कि आर्थिक सुधार आम आदमी के हितों की कीमत पर नहीं होंगे।