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6 वर्ष पहले
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जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह हर्ष का विषय है कि भारत ने इस दिशा में बेहतरीन प्रगति की है। जिलास्तरीय घर एवं परिवार सर्वे-3 (डीएलएचएस-3) से सामने आए आंकड़ों से उम्मीद बनी है कि 2017 तक 9 राज्यों में प्रति महिला शिशु जन्म दर को 2.1 तक लाने में सफलता मिल जाएगी। ये 9 प्रदेश उन 11 राज्यों में शामिल हैं, जहां जन्म दर पर काबू पाने के विशेष प्रयास किए गए हैं। गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, सिक्किम, मिजोरम और पंजाब में जन्म दर 2.0 या इससे नीचे हो चुकी है। सिर्फ उत्तरप्रदेश और बिहार ऐसे राज्य हैं, जहां यह 3 से ऊपर (क्रमशः 3.1 और 3.3) के ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। प्रति महिला 2.1 बच्चे की सकल जन्म दर को स्थानापन्न (रिप्लेसमेंट) स्तर कहा जाता है। यानी अगर यह दर इतनी रहे तो आबादी स्थिर रहेगी। जब भारत आजाद हुआ, तब अपने यहां यह दर 5.6 शिशु प्रति महिला थी। आज यह राष्ट्रीय औसत 2.3 हो चुका है। इस कामयाबी में बेशक परिवार नियोजन कार्यक्रम की बड़ी भूमिका है, मगर इसमें समाज में आई समृद्धि और जागरूकता का भी बड़ा योगदान है।
सामाजिक विकास के अध्ययनकर्ता अक्सर कहते हैं कि विकास सर्वश्रेष्ठ गर्भ-निरोधक है। यानी विकास होता है, तो लोग खुद अपने परिवार को नियोजित रखने के लिए प्रेरित होते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत ने 2020 तक परिवार नियोजन सेवाएं उपलब्ध कराने पर दो अरब डॉलर खर्च करने का लक्ष्य रखा है। इसके तहत चार करोड़ 80 लाख महिलाओं को गर्भ-निरोधक सेवाएं मुहैया कराई जाएंगी। साथ ही अभी इन सेवाओं का लाभ उठा रहीं दस करोड़ महिलाओं को इस कार्यक्रम के तहत बनाए रखने का प्रयास होगा। ये सारे काम प्रभावी ढंग से हुए तो मुमकिन है कि भारत 2040-50 तक अपनी आबादी को स्थिर करने में सफल हो जाए। अपेक्षा है कि अगली आधी सदी में जनसंख्या में गिरावट शुरू होगी। विकास एवं जन-कल्याण की योजनाओं को सफल बनाने और सबको खुशहाल जिंदगी देने के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना अति-आवश्यक है। खुशी की बात यह है कि हमारे कदम तेजी से इस ओर बढ़ रहे हैं। बढ़ती आबादी से संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। अाबादी वृद्धि दर कम होने से यह दबाव कम होगा और उनका बेहतर उपयोग संभव होगा। आबादी काबू में रहेगी तो मानव जीवन की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकेगी।