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आईएस के जाल में फंसने से बचना होगा

6 वर्ष पहले
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एक बार फिर मध्य-पूर्व में कहर ढहा रहे आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) द्वारा की गई हत्याओं से यह डर पैदा हो गया है कि यह हावी होता जा है और इसके खिलाफ बहुत कुछ करने की जरूरत है। फॉक्स न्यूज के ब्रेट बायर ने नए वीडियो के बारे में कहा, ‘यह वीडियो भयानक और बर्बर होने के साथ हाई टेक प्रचार के लिए बनाया गया है।’ यह कहकर उन्होंने इस आम भावना को ही व्यक्त किया है कि यह आतंकी संगठन अपने क्रूर व दुष्टतापूर्ण तरीकों से जड़ पकड़ता जा रहा है। किंतु क्या वाकई ऐसा है? आइए, इस वीभत्स वीडियो तक पहुंचने वाले घटनाक्रम पर गौर करें।

आईएस ने दो जापानी पुरुषों को बंधक बनाया। उनकी यह अजीब-सी कार्रवाई थी, क्योंकि मध्य-पूर्व में जापान की शायद ही कभी कोई भूमिका रही है। यहां के संघर्ष से उसका कोई सीधा संबंध नहीं है। आतंकियों ने टोक्यो से 20 करोड़ डॉलर की विशाल राशि फिरौती में मांगी। इससे पता चलता है कि इस्लामिक स्टेट का बहुचर्चित अर्थ-तंत्र उतनी अच्छी तरह काम नहीं कर रहा, जितना कि कई लोग मानते हैं। टोक्यो ने पैसा देने से इनकार कर दिया, इसलिए आतंकियों के पास ऐसे बंधक थे, जिनकी उनके लिए कोई कीमत नहीं थी। उन्होंने एक की हत्या की और फिर पेशकश रखी कि यदि जॉर्डन की सरकार आतंकी साजिदा अल-रिशावी को रिहा कर दे तो वे दूसरे बंधक को रिहा कर देंगे। यह तो और जटिल काम था।

जापान का जॉर्डन पर कोई बहुत प्रभाव नहीं है और रिशावी तो मोटेतौर पर भुला दिया गया नौ साल पहले के एक प्रकरण का संभावित आत्मघाती बम हमलावर था। यह उस समय की बात है जब इस्लामिक स्टेट का वजूद भी नहीं था। इससे संकेत मिलता है कि जब उनकी मुख्य मांग ठुकरा दी गई तो अंतिम समय में हड़बड़ी में नई मांग उठाई गई। जॉर्डन ने इस्लामिक स्टेट द्वारा पकड़े गए उसके पायलट लेफ्टीनेंट मुआथ के बदले सौदेबाजी की बात कही और इस्लामिक स्टेट उसी के हिसाब से चालें चल रहा था। हालांकि, जॉर्डन के अधिकारियों को अब लगता है कि पायलट को तो हफ्तों पहले मार दिया गया था।

पायलट को जिंदा जलाने का वीडियो किसी ऐसी कार्रवाई को छिपाने का बहाना हो सकता है, जो नाकाम रही हो। यह तो तय है कि इस्लामिक स्टेट ने अपनी करतूत को लेकर मध्य-पूर्व में होने वाली प्रतिक्रिया के बारे में गौर नहीं किया था। पूरा जॉर्डन उसके खिलाफ एकजुट हो गया है। क्षेत्र के सारे प्रमुख मौलवियों ने पूरी ताकत से इस घटना का विरोध किया है और जापान ने आतंकी गुट के खिलाफ अधिक सहायता व समर्थन देने की तैयारी दिखाई है। स्पष्ट है कि आर्थिक रूप से कमजोर पड़ते इस्लामिक स्टेट पर मध्य-पूर्व में ही दबाव और बढ़ गया है। निश्चित ही वह यह तो नहीं चाहता होगा।

इस बीच, लड़ाई के मैदान से भी इस्लामिक स्टेट के लिए अच्छी खबर नहीं है। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के विद्वान केनेथ पोलाक ने बताया है कि किस तरह इराक में इस्लामिक स्टेट को मुंह की खानी पड़ी है। शायद जापानी बंधक की हत्या और उसके क्रूर वीडियो का यही कारण है। वह लोगों में डर और जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया पैदा करने के आतंकवाद के मूल उद्‌देश्य को अच्छी तरह समझता है। जब 1960 और 1970 के दशक में मध्य-पूर्व में आतंकवाद उभरा था तो इतिहासकार डेविड फ्रॉमकिन ने ‘फॉरेन अफेयर्स’ पत्रिका में जो लेख लिखा वह शायद आतंकवाद को सबसे अच्छी तरह से समझाता है। उन्होंने ध्यान दिलाया था कि फ्रांसीसी क्रांति के बाद से ही आतंकवाद कमजोर गुटों की रणनीति रहा है। इसके जरिये शक्तिशाली होने की झूठी तस्वीर पेश की जाती है और सबसे बड़ी बात, देखने वाले इसका गलत अनुमान लगा लेते हैं। फिर इसकी उग्र प्रतिक्रिया से आतंकवादियों को वांछित नतीजे मिलते हैं।

फ्रॉमकिन दो उदाहरण देते हैं, जिनसे बहुत अच्छे सबक मिलते हैं। उन्होंने 1945 में इरगुन नामक आतंकी गुट के सरगना के साथ हुई मुलाकात का जिक्र किया था। इरगुन फििलस्तीन स्थित 1500 यहूदी आतंकियों का गुट था, जो उस वक्त ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था। इरगुन जानता था कि वह ब्रिटिश साम्राज्य की शक्तिशाली सेना को परािजत नहीं कर सकता इसलिए उसके आतंकियों ने विस्फोट से इमारतें उड़ाकर अराजकता का महौल खड़ा करने का फैसला किया। इरगुन लीडर ने कहा, ‘इससे ब्रिटिश शासक जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देकर पूरे देश को सैन्य शिविर में बदल देंगे। इसके लिए उन्हें पूरे साम्राज्य से फौज बुलानी पड़ेगी और उसकी तिजोरी पर दबाव पड़ेगा और आखिरकार ब्रिटेन को फििलस्तीन छोड़कर जाना पड़ेगा।’ फ्रॉमकिन ने ध्यान दिलाया कि इरगुन ने देखा कि वह इतना छोटा है कि ब्रिटेन को नहीं हरा सकता पर ब्रिटेन इतना बड़ा जरूर है कि वह खुद को पराजित कर सके। इस्लामिक स्टेट की रणनीति में इसी की कुछ झलक दिखाई देती है। अमेरिका व उसके सहयोगियों को निशाना बनाकर वह बर्बर कार्वाइयां करने, उसके वीडियो जारी करने जैसी करतूतें कर रहा है ताकि अमेरिका सीरिया की रणभूमि पर उतरने के लिए मजबूर हो जाए। उसे उम्मीद है कि यह जटिल, रक्तरंजित और लंबे समय तक चलने वाला युद्ध महाशक्ति की ताकत को चूस लेगा और उस पर पड़ने वाला दबाव कम होगा।

फ्रॉमकिन का एक और उदाहरण : 1950 और 60 के दशकों में अल्जीरिया को फ्रांस के चंगुल से छुड़ाने के लिए राष्ट्रवादियों का एक गुट नेशनल लिबरेशन फ्रंट (एफएलएन) संघर्ष कर रहा था। फ्रांसीसी सरकार की दलील थी कि अल्जीरिया कोई उपनिवेश नहीं बल्कि फ्रांस का हिस्सा है। इसके सारे लोगों के साथ फ्रांसीसियों जैसा ही व्यवहार किया जाता है। फिर एफएलएन ने फ्रांसीसी सरकार को उकसाने के लिए आतंकवादी अभियान शुरू किया ताकि वह जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दिखाकर सारे अल्जीरियाई मुस्लिमों के साथ संदिग्धों जैसा बर्ताव करने लगे। फ्रॉमकिन ने ध्यान दिलाया, ‘जब बस में बम लगाया जाता तो फ्रांसीसी सोचते कि बम बस को उड़ाने के लिए लगाया गया है, जबकि एफएलएन का उद्‌देश्य बस उड़ाना नहीं, अधिकारियों को सारे गैर-यूरोपीय लोगों को संदिग्ध मानने के लिए उकसाना था।’

यूरोप में हाल की आतंकवादी घटनाओं में इस तरह की सुविचारित रणनीति नहीं है। हालांकि, इनसे यूरोपीय सरकार व लोग सारे मुस्लिमों को संदिग्ध व खतरनाक मानने पर मजबूर हो सकते हैं। ऐसा होने पर जेहादी और आतंकवाद महत्वपूर्ण लक्ष्य हासिल करने में कामयाब हो जाएंगे। ऐसा नहीं होना चाहिए। फ्रॉमकिन ने अपने लेख में निष्कर्ष निकाला कि आतंकवाद को रोकने में हमेशा ही कामयाबी नहीं मिल सकती, लेकिन निश्चित रूप से इसे पराजित किया जा सकता है। अाप वह करने से इनकार कर दें, जो वे चाहते हैं। आईएसआईएस को पराजित करने के लिए भी यही रवैया अपनाना होगा। हताशा में वह खूनखराबा जारी रखेगा ताकि पश्चिमी समाज में मुस्लिमों को संदेह की निगाह से देखा जाए और उसे इसका लाभ मिल जाए। दुनिया को ऐसी प्रतिक्रिया देने से बचना होगा।
फरीद ज़कारिया
टाइम मैगज़ीन के एडिटर एट लार्ज
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