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मोदी-शाह के नेतृत्व की पहली पराजय

6 वर्ष पहले
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दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले आम अादमी पार्टी खड़ी थी, लेकिन उस पर दांव पूरे विपक्ष ने लगा दिया था। वह शायद यह धारणा तोड़ना चाहता था कि चुनावों में नरेंद्र मोदी का चेहरा और अमित शाह का प्रबंधन अभेद्य हैं। एक हद तक विपक्षी दलों ने यह मकसद हासिल कर लिया है। मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा पहली बार परास्त हुई है। गुजरात में यह नेतृत्व हमेशा अपराजेय रहा। राष्ट्रीय स्तर पर जब से उन्होंने भाजपा की कमान संभाली, पार्टी लगातार कामयाब हो रही थी। किंतु दिल्ली विधानसभा चुनाव में यह रुझान पलट गया। क्यों? यह भाजपा के लिए आत्म-मंथन का विषय है। दिल्ली में लोकसभा चुनाव की तुलना में उसे 14 फीसदी वोट कम मिले हैं। इसके पहले झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनाव में उसके वोट 9-9 फीसदी घटे थे। अक्टूबर में महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों मे वह लोकसभा में हासिल वोट प्रतिशत को बनाए रखने में सफल रही, इसीलिए यह सवाल उठेगा कि क्या लोगों ने केंद्र सरकार से जो ऊंची अपेक्षाएं की थीं, वे पूरी नहीं हो रही हैं? अब जाहिर है, विपक्ष अधिक आक्रामक मुद्रा के साथ इस धारणा को और गहरा बनाने के प्रयास करेगा। नतीजतन, नई परिस्थितियों का प्रभाव आर्थिक सुधारों के सरकार के एजेंडे पर पड़ सकता है।
ऐसा होना दुर्भाग्यपूर्ण होगा। भाजपा विकास और सुशासन के लिए भारी जनादेश लेकर केंद्र की सत्ता में आई थी। पिछले नौ महीनों में उसने इस दिशा में कई पहल की है, लेकिन उनके ठोस परिणाम सामने आते अभी नहीं दिखते। उधर, कुछ नेताओं एवं भाजपा के सहयोगी संगठनों के अवांछित बयानों और गतिविधियों ने राष्ट्रीय चर्चा को भटकाया है। विचारणीय है कि क्या दिल्ली में भाजपा के खिलाफ आए असाधारण जनादेश के पीछे ऐसे कारणों की भी भूमिका है? जनता अब सकारात्मक होते देखना चाहती है। उसने नकारात्मकता को बिल्कुल खारिज कर दिया है। भाजपा को याद रखना चाहिए कि 1984 के आम चुनाव में अभूतपूर्व जीत के ढाई साल बाद हरियाणा विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त से राजीव गांधी की चमक फीकी पड़ गई थी। वैसा अब न हो, उसे यह सुनिश्चित करना होगा। वरना, 2014 के अप्रत्याशित जनादेश से जगी उम्मीदें धरी-की-धरी रह जाएंगी।