‘मैं पूर्ण शिक्षक नहीं हूं- चूंकि मुझे गाना गाना नहीं आता’
-पूर्ण शिक्षक के रूप में प्रशंसा के जवाब में
वैष्णव विद्यालय के प्राचार्य (स्व.) बीरेश्वर चक्रवर्ती, अपने विदाई समारोह पर
शांति निकेतन में विश्व भारती की स्थापना किसने की? कोई भी बता देगा। और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की? किसी को नहीं पता।
इसीलिए पतन होता है। कुछ महान् हस्तियां, महान सपने साकार करती हैं। जैसा कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने विश्व भारती के रूप में किया। किन्तु उनके बाद की नेतृत्व पंक्ति इतनी कमज़ोर रही कि उनका सपना तो टूट ही गया - दूसरों के सपनों को और तोड़ गया। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी कोई एक हजार वर्ष पहले बनी थी। किसी को कुछ नहीं पता कि किसने वो सपना देखा? कैसे बनी? वास्तव में कब बनी? किन्तु यह विश्वविद्यालय आज भी उतने ही गौरव के साथ संचालित है। क्योंकि एक के बाद एक नेतृत्व संभालने वाले श्रेष्ठ शिक्षक आते गए।
गुरुदेव की गरिमा तो अजर-अमर है/रहेगी। किन्तु उनकी शिक्षा के सर्वोच्च स्तर के संस्थान को नष्ट करने वालों को कैसे, क्यों और किसने चुना - यह यक्ष प्रश्न अनुत्तरित ही है। आज विश्व भारती, कुलपति सुशांत दत्तागुप्ता के भयावह कारनामों से कलुषित है। दूसरा जादवपुर
विश्वविद्यालय कुलपति अभिजीत चक्रवर्ती के बर्बर अत्याचार से कराह रहा है।
दोनों विश्वविद्यालयों की स्थापना भारत की गरिमामय शैक्षणिक परंपरा की प्रतीक है। विश्व भारती गुरुदेव ने स्वयं स्थापित की। कलकत्ता में जादवपुर विश्वविद्यालय बंगाल के प्रखर राष्ट्रवादियों ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बनाया था। गुरुदेव के साथ अनेक बुद्धिजीवी और क्रांतिकारी इसके लिए आगे आए थे। इतिहास है कि अंग्रेजों ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी को ब्रिटिश तौर-तरीकों की शिक्षा का कुछ ऐसा माध्यम बना दिया था कि वहां ‘भारतीय अंग्रेज’ बनने लगे थे। इस बात का भी जिक्र है कि क्रांतिकारियों ने इसे ‘ग़ुलामखाना’ घोषित कर दिया था। इसीलिए, स्वतंत्रता संग्राम के दिग्गजों ने नेशनल काउंसिल की स्थापना की थी - जो आज़ादी के बाद जादवपुर यूनिवर्सिटी कहलाई।
यानी अत्याचार के विरुद्ध स्थापित विश्वविद्यालय ही आज अत्याचार की प्रयोगशाला बना दिया गया है। वह भी उसी के कुलपति द्वारा। आधी रात को, कुलपति चक्रवर्ती भारी पुलिस बल से छात्रों के रोष को रौंदते हैं। छात्रों का दोष है उनका रोष। जो एक छात्रा की गरिमा नष्ट करने के कुप्रयास के विरुद्ध कुलपति की चुप्पी पर है। पहले एक शिक्षक ऐसा किसी मासूम, नई छात्रा के साथ कर चुके हैं। इस बार होस्टल में छात्रों ने किया। भयंकर वातावरण। भ्रष्ट नेतृत्व। कोई देखने वाला नहीं। सुनने वाला नहीं। सज़ा का तो ख़ैर, सवाल ही नहीं। ऐसे ही विश्व भारती के कुलपति दत्तागुप्ता। कहीं आगे। पहले यौन प्रताड़ना का आरोप लगा। सजा से बच गए। हर जांच को अपनी सुविधा से मोड़ना जो जानते थे। पद्मश्री मिलने वाला था। सरकारें, चाहे केंद्र हो या राज्य, सभी उनके अपराध की अनदेखी करती रहीं। फिर भारी हंगामा मचा। अंतिम मौके पर सरकार ने इस राष्ट्रीय सम्मान से उन्हें वंचित कर दिया।
पद्मश्री कलंकित होने से रह गया।
किन्तु विश्व भारती को कलुषित करने के लिए छोड़ गया।
जादवपुर यूनिवर्सिटी का उद्देश्य उसके लोगो पर लिखा है : टू नो इज़ टू ग्रो। संभवत: कुलपति चक्रवर्ती जानते हैं कि बनने, बढ़ने के लिए क्या जानना चाहिए। खबरें हैं कि उन्होंने छात्रों में भी भारी फूट डलवा दी है। ठीक वैसी ही जैसी कि तत्कालीन कलकत्ता यूनिवर्सिटी में भारतीयों को मानसिक रूप से अंग्रेज बनाने वाली शिक्षा के विरोध में लॉर्ड कर्ज़न ने पड़वाई थी। पहले नौजवान भारतीय छात्रों में। बाद में बंगाल को ही तोड़कर। आज का बांग्लादेश तब ईस्ट बंगाल कहलाया। दूसरा हिस्सा पश्चिम बंगाल-ओड़िशा बना। फूट की नीति तो अपनी जगह है - मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व ऐसे निकृष्ट वातावरण को और बढ़ावा क्यों दे रहा है? यह समझ से परे हैं। मुख्यमंत्री
ममता बनर्जी ऐसे कुलपतियों को क्यों सहायता दे रही हैं? जहां कुलपति, सरकार की कठपुतली बन गए हों - वहां कुलाधिपति यानी राज्यपाल कई बार सख्त़ कार्रवाई करते हैं। यहां तो राज्यपाल कुछ न कर, हर अनुचित को होने देने के दोषी बन रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में एक से एक बड़ी हस्तियां, लेखक, शिक्षाविद्, राज्यपाल यानी कुलाधिपति के रूप में बनकर आए। इनमें गोपालकृष्ण गांधी जैसे बुद्धिजीवी शामिल हैं। सबने कहा कि विश्व भारती की गरिमा लौटाएंगे। विश्व भारती के संरक्षक बाकायदा विजि़टर के रूप में राष्ट्रपति होते हैं। और चांसलर कोई और नहीं स्वयं प्रधानमंत्री होते हैं। उनके नेतृत्व में ऐसा हो रहा है तो बाकी की क्या स्थिति होगी? वे क्यों नहीं कुछ करते विश्व भारती के लिए? और कुलपतियों को क्या हो रहा है? क्यों इतना पतन हो गया है? कुलपति यानी समूचे गुरुकुल का अधिपति। कुल का सरंक्षक।
कौन होते हैं कुलपति?
जब पं. जवाहरलाल नेहरू ने पं. मदनमोहन मालवीय को कुलपति बनाए जाने की बात कही - तब तकनीकी कमियां गिनाई गई थीं। कि शोध-ग्रंथ होना चाहिए। इतने शोध-पत्र प्रकाशित होने चाहिए। इतने प्रतिशत अंक होने चाहिए। इतनी न्यूनतम पात्रता होनी चाहिए। आदि। अनादि। इत्यादि।
पं. नेहरू ने दो टूक कहा था : एक ही शब्द में स्पष्ट होगा कि कुलपति कौन होगा :
‘मैन ऑफ एमिनेन्स’!
यानी उच्च योग्यता वाला। लब्धप्रतिष्ठित।
यह तो कोई पात्रता नहीं हुई। विरोध हुआ। डिक्शनरी में एमिनेन्स का अर्थ बहुत ही अस्पष्ट है, व्यापक है। इसे प्रॉमिनेंस, रेपुटेशन, इम्पोर्टेन्स, फेम, ग्रेटनेस और सुपीरियर सबकुछ बताया गया है। किन्तु वास्तव में पं. नेहरू की सोच स्पष्ट थी।
जो ‘मैन ऑफ एमिनेन्स’ होगा - वह तो होगा ही। अर्थ खोजने की आवश्यकता नहीं होगी।
सुशांत दत्तागुप्ता और अभिजीत चक्रवर्ती को कोई भी ‘मैन ऑफ एमिनेन्स’ मानने को तैयार क्यों होगा। इन्हें ही क्यों, अनेक कुलपति ऐसे हैं। देश में एक आक्रामक अभियान इस बात का छेड़ा जाना चाहिए ताकि विश्वविद्यालयों की सफाई शुरू हो। उच्च शिक्षा के मंदिर पवित्र बनें।
आरम्भ ‘कुलपति कौन हैं’ इसी प्रश्न से हो। ‘मैन ऑफ एमिनेन्स’ हैं या नहीं? सभी कुलपति निस्वार्थ शिक्षक हों जो परम्परा, प्रतिष्ठा और अनुशासन के कठोर बंधन में स्वेच्छा से बंधे हों – यह असंभव है। किन्तु बंधना ही होगा। गंगा का उद्गम चमत्कृत कर देने वाला ही होना चाहिए।
कई शिक्षक, इस लड़ाई में छात्रों के साथ सहर्ष, सगर्व खड़े हुए हैं। यही सच्ची शिक्षा है।
विश्व भारती व जादवपुर विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को दंडित कर, देश परिसरों को उन्मुक्त वातावरण दे सकता है। व्हेअर हेड इज़ हेल्ड हाई एंड नॉलेज इज़ फ्री।
- (लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एिडटर हैं।)