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  • Bhaskar Editorial Asambhav Ke Virudh By Kalpesh Yagnik

क्या आप भी मोदी की अमेरिका यात्रा पर ऐसी बातें कर रहे हैं?

7 वर्ष पहले
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‘अमेरिकी कैसे हैं? आधे अमेरिकी अख़बार नहीं पढ़ते। आधे राष्ट्रपति चुनाव में वोट डालने नहीं जाते। उम्मीद है, दोनों ‘आधे’ एक ही हैं!’
- अमेरिकी लेखक गोर विडाल

‘अमेरिकी कारोबार कैसे चलता है? एक ही बॉस है : कस्टमर। जो चेयरमैन से लेकर किसी को भी बर्खास्त कर सकता है। सिर्फ अपना पैसा कहीं और लगाकर!’
- वॉल्मार्ट के सैम वॉल्टन
‘इतने प्रधानमंत्री अमेरिका गए, क्या किसी यात्रा पर इतना माहौल बना? मोदी ने सिद्ध कर दिया है कि उनकी बात ही कुछ अलग है। आप मान क्यों नहीं रहे? समझ क्यों नहीं पा रहे?’
यही शुरुआत थी। वही कॉफी हाउस। लोग अलग। ऊंचे से, सफेद शर्ट वाले, बैंक में ऊंचे ओहदे पर थे। उन्होंने ही यह प्रश्न उठाया था। प्रोफेसर को इस पर कड़ी आपत्ति थी। ‘लाएंगे क्या देश के लिए - बस यह महत्वपूर्ण है। यह पता चलेगा तो ही लोग मानेंगे। वरना प्रधानमंत्री तो अमेरिका जाते ही हैं। शरद जोशी के व्यंग्य भूल गए क्या? वही - कि विदेशी प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति आते हैं। विमान की सीढ़ियों पर मुस्कराते हैं। हाथ उठाकर घोषणा कर देते हैं कि आपका देश कितना महान् है… बगैर देखे ही!
संपादक ने कड़े स्वर में टोका - प्रोफेसर साहब, वो व्यंग्य विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के हमारे यहां आने पर था। यहां बात हमारे प्रधानमंत्री की चल रही है। और, वह जमाना गया। गुज़र गया। आज की दुनिया में आइए। वकील सा’ब मोदी के घोर विरोधी थे। उन्होंने तत्काल कहा: कुछ लाएंगे? ला पाएंगे? जनाब, मोदी जी मिल रहे हैं ओबामा से। दोनों सपनों के सौदागर हैं। बातों के बाजीगर हैं। एकदम एक जैसे।
45-47 साल की उम्र के, कुछ ज्यादा ही मीठा बोलने वाले बिजनेसमैन : आप सभी अपनी जगह सही हैं। लेकिन मोदी वहां कारोबार करने गए हैं। ‘बिज़नेस डिप्लोमेसी’ कहते हैं अखबार। खूब बिज़नेस लाएंगे। और क्या?
बैंकर ने बिज़नेसमैन का साथ पाया तो प्रसन्न हुए। तत्काल बताया : मोदी एक जबर्दस्त प्रेजेन्टेशन देने वाले हैं वहां। अमेरिका के सबसे बड़े कॉर्पोरेट हेड्स को। बताएंगे कि कैसे उनकी सरकार ने 3 ट्रिलियन डॉलर का इन्वेस्टमेंट प्लान तैयार कर रखा है। पावर, कोल, रोड, पोर्ट, टेलीकॉम - इन्फ्रास्ट्रक्चर में 10% ग्रोथ लानी है। मंत्रियों से कहा है कि ग्रोथ लानी ही है।
वकील सा’ब को जैसे मौका मिल गया। बोलते गए - मिनिस्टर्स और मीडिया - दोनों को मोदी ने कह रखा है - ना! मतलब दोनों को नो इम्पोर्टेन्स।
बिज़नेसमैन : वकील सा’ब, बात अमेरिका दौरे को लेकर हो रही है…। संपादक ने किन्तु तीखी प्रतिक्रिया दी : मीडिया को किसी से कोई इम्पोर्टेन्स चाहिए ही नहीं। मीडिया तो मिरर है। आपकी शक्ल दिखाता है। हो सके तो अपनी शक्ल सुधारिए, आइना मत तोड़िए। और किसने कहा मीडिया नहीं चाहिए मोदी को? अमेरिका जाने से एेन पहले सीएनएन को इंटरव्यू दिया। (…बीच में काटते हुए वकील - ‘और वह भी फरीद ज़कारिया को।’ और सुर्खियां भी क्या बनवाईं, कि भारत के मुसलमान अल कायदा में भर्ती नहीं होंगे? यह क्या बात हुई भला?)
संपादक : आप आउट ऑफ कन्टैक्स्ट बातें न करें। मैं कुछ और बता रहा था। हां, फिर वॉल स्ट्रीट जर्नल में लेख लिखा। यानी अमेरिका यात्रा है तो अमेरिकी मीडिया को इस तरह इम्पोर्टेन्स दिया। मीडिया तो हर जगह, हर किसी को, हर अच्छे-बुरे वक़्त में चाहिए ही...!
प्रोफेसर : पत्रकारों से कौन नहीं डरता? न जाने क्या लिख दें? अब मोदी पर ही लिख दिया कि मंगलयान को ऑर्बिट में रखना अपनी जगह है, अमेरिका से इन्वेस्टमेंट लाना अपनी जगह! अब आप ही बताइए, ये भी कोई तुलना हुई? और तो और, यह लिखा कि जब भारतीय ही भारत में पैसा नहीं लगा रहे तो अमेरिकन क्यों लगाएंगे? संपादकजी, आपने तो अभी तक कुछ नहीं लिखा। तो कुछ ऐसा लिखिएगा कि साधारण लोग भी समझ सकें। कुछ डिप्लोमेसी या स्ट्रेटेजिक या क्या कहते हैं - बायलेटरल - द्विपक्षीय, बहुपक्षीय वगैरह मत लिखिएगा।

संपादक : मैं ऐसा कुछ लिखूंगा जो कोई भी समझ सके। मैं लिखने वाला हूं कि अमेरिका कभी किसी को कुछ नहीं देता। उद्देश्य साफ है : द वर्ल्ड इज़ प्योर कॉमर्स; गिव एंड टेक। (बिज़नेसमैन, बीच में काटते हुए - लेकिन कहा तो मोदी ने था न कि कॉमर्स इज़ इन माय ब्लड। गुजराती हूं। जापान में।) जैसा कि संपादकों की अनसुनी करने की आदत होती है, संपादक अपनी ही बात कहते गए। मैं बताऊंंगा कि अमेरिकी बिज़नेसमैन तब आएंगे जब आप उनके लिए कोई ‘सरप्राइज़’ दें। बैंकर : ऐसे सरप्राइज़ लेकर कोई प्रधानमंत्री नहीं जाता।
संपादक : वही तो चाहिए। आप तो डबल टैक्स लगाते हो। केस कर देते हो। इन्टेलैक्चुअल प्रॉपर्टी को नहीं समझ पा रहे...
प्रोफेसर : माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स को पढ़ा था न? कहा था इन्टेलैक्चुअल प्रॉपर्टी की शेल्फ लाइफ - उम्र - एक केले की उम्र जितनी रहेगी। वाह साहब, कैंसर की दवा एक लाख रु. महंगी बेचोगे भारत में। इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी नहीं, इल्लीगल प्रॉपर्टी कमाना कहना चाहिए ऐसे अमेरिकी कानूनों को! संपादक : मैंने कब कहा कि मैं अमेरिका के पक्ष में लिखूंगा? कैंसर दवा पर तो सबसे पहले मैंने ही खबर दी थी। हेडलाइन थी...सबसे सस्ती कैंसर दवा हम बनाते हैं..
बिज़नेसमैन : लेकिन आप मोदी के पक्ष में भी तो नहीं लिख रहे?
बैंकर : जबकि दो दिन पहले ही मोदी कितना अच्छा ‘मेक इन इंडिया’ कैम्पेन लाएं हैं। ग़ज़ब की टाइमिंग। अमेरिकी दौरे के ऐन पहले दुनिया को अपील की आओ, बनाओ। भारत में।
संपादक : बातें ग़ज़ब की हैं। काम ग़ज़ब का कब होगा? वकील सा’ब : ये लिखो।
प्रोफेसर : लाना चाहें मोदी तो खूब बिज़नेस ला सकते हैं। मैंने पूरी स्टडी की है। अभी अमेरिका का 24 बिलियन डॉलर यहां लगा हुआ है। लेकिन यह सिर्फ 0.5% है दुनिया में लगाए उसके कुल पैसों का। दोनों देशों के बीच 100 बिलियन डॉलर का करोबार है जो कम से कम 800 बिलियन होना चाहिए। यही चुनौती है। वकील : अरे, अमेरिका चाहेगा वेस्ट एशिया, यूक्रेन में हमारा साथ। हां में हां। बदले में ले जाओ 100-150 बिलियन...
बैंकर : कमाल है वकील सा’ब, क्या दुनिया ऐसे बिक रही है?
संपादक : इस्लामिक स्टेट आतंकियों से अमेरिका डर नहीं रहा। लेकिन उन्हें मार गिराने में तो डर ही रहा है। ओबामा कोई बुश तो हैं नहीं कि युद्ध कर, कुचल दे। युद्ध से कितनी बदनामी होती है। लेकिन हमें क्या? प्रोफेसर : लेकिन वहां मोदी करने क्या जा रहे हैं?
बैंकर : कल तक मोदी पर प्रतिबंध लगा रखा था अमेरिका ने। आज वहीं रॉक स्टार जैसा भव्य स्वागत हो रहा है। बिज़नेसमैन : सब गुजरातियों का प्रेम है।
बैंकर : वहां 32 लाख भारतीय हैं। वे मेडिसन स्क्वेयर गार्डन में दुनिया को मोदी की, भारत की ताकत दिखाएंगे। संपादक : टीवी देख रहे हैं न? कोई कह रहा है नमोस्ते अमेरिका। तो कोई नमोरिका। क्या हो रहा है ये? वकील : इसे चापलूसी कहूंगा मैं तो।

प्रोफेसर : माहौल है तो टीवी तो दिखाएंगे। वकील : दिखाओ।
संपादक : माहौल बनाओ मत। यह सही है। और सौ बात की एक बात। चीन को गुजरात बुला लिया। जापान जाकर ड्रम बजा लिया। 55 बिलियन डॉलर का दोनों से वादा ले आए। न्यूयॉर्क में नवाज़ शरीफ को खारिज कर देंगे। वॉशिंगटन में ओबामा से रिश्ता मज़बूत करेंगे। लेकिन चीन-जापान से तो कोई 10 गुना बड़ा वादा और पैसा चाहिए अमेरिका से। वो पैसा भले ही तीन साल में मिले। वही भारतीय नौजवानों के काम का है। वही नौकरियां देगा। तरक्की देगा। वरना तो यह यात्रा, एक और प्रधानमंत्री की, एक और यात्रा बनकर रह जाएगी।
प्रधानमंत्री की यात्राओं के भारी माहौल से हम साधारण नागरिकों को कोई सीधा लाभ मिले, यह असंभव है। किन्तु लेना ही होगा। निवेश के हर वादे, हर करार पर यदि जनता प्रश्न पूछने लगे- तो सरकारें हिलने लगेंगी। वादे नहीं, काम होने लगेंगे।
माहौल बनता है तो खूब बनने दीजिए। करोड़ों नौजवानों के लिए विदेशी निवेश तभी होगा जब माहौल बनेगा। अभी तो वर्ल्ड बैंक ने हमें 189 देशों में 134 वें क्रम पर रखा है। यानी 133 देशों में पैसे लगाने, कारोबार करने का माहौल हमारे यहां से बेहतर है।
बदलिए। माहौल बदलना ही होगा।
- (लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)