आखिर भाजपा का विजयी रथ न सिर्फ दिल्ली में आकर रुका बल्कि पूरी तरह बिखर गया है। भाजपा को 32 फीसदी वोट के साथ सिर्फ 3 सीट मिली है। 2013 के विधानसभा चुनाव की तुलना में ‘आप’ को 39 सीटों व 22 फीसदी वोटों का फायदा हुआ। विधानसभा चुनाव की तुलना में भाजपा के वोट में डेढ़ फीसदी की मामूली कमी आई, लेकिन लोकसभा चुनाव की तुलना में उसे करीब 12 फीसदी वोट कम मिले। निकटतम प्रतिद्वंद्वी से 13 फीसदी वोटों से आगे रही पार्टी कैसे पिछड़ गई? ‘आप’ को सफलता कांग्रेस के पतन की कीमत पर मिली है। वास्तव में चुनाव ‘आप’ के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी अरविंद
केजरीवाल पर जनमत संग्रह में बदल गया था। भाजपा की कोई रणनीति काम नहीं आई।
किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने का तो उल्टा ही असर हुआ। न सिर्फ वे अतिरिक्त समर्थन जुटाने में नाकाम रहीं, बल्कि प्रचार की उनकी शैली ने पार्टी कार्यकर्ताओं व समर्थकों को रुष्ट कर दिया। अंतत: केजरीवाल के खिलाफ आक्रामक नकारात्मक प्रचार शुरू हो गया। ‘आप’ का रवैया सकारात्मक रहा। भाजपा की हार के पीछे उसकी यही नकारात्मकता देखी जा सकती है। धनी लोगों की पार्टी होने की भाजपा की छवि ने गरीब व निम्न वर्ग को ‘आप’ के पक्ष में ध्रुवीकृत कर दिया। पिछले चुनाव में भी ऐसा ध्रुवीकरण था, लेकिन इस बार यह बहुत अधिक हो गया।
आप को 11 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं का भी समर्थन मिला, जो 7-8 सीटों पर चुनाव का रुख बदलने में सक्षम थे। मुस्लिमों ने पिछले चुनाव में ‘आप’ का रुख किया होता तो इस चुनाव की जरूरत ही नहीं पड़ती। दलितों ने बड़ी संख्या में ‘आप’ को वोट दिया, इसलिए ‘आप’ दलितों के लिए आरक्षित सारी सीटें जीतने में कामयाब रही। पंजाबी भाजपा के प्रति वफादार रहे पर उतना पर्याप्त नहीं था। भू-अधिग्रहण अध्यादेश का विपरीत असर हुआ, क्योंकि उत्तरप्रदेश व हरियाणा में जमीन संबंधी हित रखने वाले जाट कुछ सीटों पर प्रभावी संख्या में थे। उन्होंने ‘आप’ को वोट दिया। यह मोदी की हार तो है ही पर मैं इसे भाजपा की ज्यादा बड़ी हार कहूंगा।
(लेखक सीएसडीएस, दिल्ली के डायरेक्टर हैं)