जो राजनीतिक पंडित और नेतागण दिल्ली चुनाव में
नरेंद्र मोदी और
किरण बेदी की हार बता रहे हैं, वे इसका सतही आकलन कर रहे हैं। झारखंड और
जम्मू-कश्मीर में जीत दिलाने वाले मोदी सिर्फ दो महीने के भीतर इतने अलोकप्रिय कैसे हो गए? दरअसल, दिल्ली के मतदाताओं ने ‘आप’ के इस वादे पर भरोसा किया कि वह भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाएगी और वीवीआईपी संस्कृति से दूर रहेगी।
‘आप’ की भारी जीत के अन्य कारण गिनाने वालों को भ्रष्टाचार के वास्तविक कुपरिणामों का पता नहीं है। लोकसभा चुनाव में यदि नरेंद्र मोदी एनडीए को भारी जीत दिला पाए तो उसका भी प्रमुख कारण यही था कि लोग मनमोहन सरकार के महा घोटालों से चिंतित थे। स्वाभाविक ही था कि मनमोहन सरकार की कमीज से नरेंद्र मोदी की कमीज जनता को काफी उजली लगी। गत दिसंबर में अब्दुल्ला परिवार और सोरेन परिवार की कमीजें मोदी की कमीज से अधिक उजली भला किसे लग सकती थीं? पर यही बात दिल्ली में नहीं थी।
केजरीवाल के 49 दिनों के शासनकाल में दिल्ली के लोगों ने शासन के भ्रष्टाचार में चमत्कारिक रूप से कमी महसूस की। पर केंद्र में मोदी सरकार बनने के बावजूद दिल्ली के भाजपानीत म्यूनिसिपल काॅर्पोरेशन के भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आई। यहां तक कि मोदी सरकार भी भ्रष्टाचार से उतनी कठोरता से लड़ती नजर नहीं आई। भाजपा को एेसी हार उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भी झेलनी पड़ेगी, ऐसा नहीं लगता, क्योंकि जाहिरा तौर पर मुलायम परिवार की कमीज की अपेक्षा मोदी की कमीज काफी उजली साबित होगी।
‘आप’ मौजूदा राजनीति का विकल्प नहीं,बल्कि वैकल्पिक राजनीति खड़ी करने में विश्वास करती है। परंपरागत दलों के अस्तित्व के लिए बेहतर तो यही होगा कि वे भी सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति जल्द से जल्द अपना लें।
(लेखक, दैनिक भास्कर पटना के एडिटोरियल एडवाइजर हैं।)