.सुरेंद्र किशोर
चूहों को भगाने के लिए उनके बिलों में पानी डाला जाता है। इधर, सरकारी बंगलों को कुछ नेताओं के अनधिकृत कब्जे से मुक्त करने के लिए पानी-बिजली के कनेक्शन काटने पड़ रहे हैं। यह कितनी शर्म की बात है पर, यही है आज की राजनीति का चेहरा! पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह नई दिल्ली के सरकारी बंगले को खाली करने पर तभी राजी हुए जब पानी-बिजली के कनेक्शन काट दिए गए। हालांकि, इस मामले में वे अकेले नहीं हैं।
ऊपर बताई तुलना थोड़ी अटपटी जरूर लगेगी, पर आखिर क्या किया जाए! 17 नवंबर 2005 को ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि वे सभ्य लोगों की भाषा समझकर बंगले खाली नहीं करते हैं तो उन्हें कानून की भाषा समझाई ही जानी चाहिए। इसके बावजूद कब्जेदार नहीं माने। अवैध कब्जेदारों में तब कई पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व राज्यपाल तथा अन्य क्षेत्रों के करीब साढ़े चार सौ वीआईपी शामिल थे। आजादी के तत्काल बाद के उन नेताओं की पीढ़ी अब समाप्त हो चुकी है, जो चुनाव हारने के तत्काल बाद सरकारी मकान खाली कर देते थे।
स्थिति इसलिए भी बिगड़ी, क्योंकि कुछ मामले में तो सरकारें कुछ खास लोगों को अवैध रूप से बंगलों में रहने देती हैं, पर कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने लगती हैं। सरकार कुछ खास दिवंगत नेताओं के स्मारक बनाने के लिए बड़े -बड़े बंगले व भूखंड मुहैया करा देती है, पर उतने ही महत्वपूर्ण कुछ अन्य नेताओं के बारे में ऐसा फैसला नहीं करतीं, जिस मकान से अजित सिंह को हटाया गया, उसे चरण सिंह का स्मारक घोषित कर देने की कुछ लोग मांग कर रहे थे।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का एक ताजा निर्णय सरकारी बंगलों को स्मारक घोषित करने के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने गत 7 जुलाई 2013 को इस समस्या से निपटने के लिए 20 सूत्री सुझाव भी दिए थे। अदालत ने कहा था कि सेवामुक्त हो जाने के बावजूद यदि मंत्री, अफसर और जज भी सरकारी बंगले नहीं छोड़ते हैं तो उनकी भी पेंशन रोक दी जानी चाहिए। पहले फैसलों को टालते रहने वाली सरकार थी। अब केंद्र में काम करने वाली सरकार आई है। उसने देखा कि आवास के अभाव में कई मंत्री कामकाज ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। 8 अगस्त 2014 को मोदी सरकार ने यूपीए सरकार के 16 मंत्रियों को नोटिस दिया कि वे बंगलों को खाली कर दें।
आखिर देश के ये बड़े-बड़े नेता अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर क्यों बंगलों पर अपना कब्जा बनाए रखना चाहते हैं? उनके इस गैर-कानूनी काम से आम लोगों में यह धारणा बनती है कि वे अन्य तरह के भी गैर-कानूनी और असंवैधानिक काम करने से परहेज नहीं करते होंगे, भले वे ऐसा करते हों या नहीं। दरअसल सत्ता के मुख्य केंद्र के करीब के बंगलों से अलग तरह की धाक बनती है। एक बार फिर सत्ता में आ जाने के लिए प्रयास, जोड़-तोड़ या खुशामद के काम में लगे रहने में हारे-पिटे नेताओं को सहूलियत होती है। कुछ अमीर नेतागण तो बाजार दर पर भी भारी किराया देने को तुरंत तैयार हो जाते हैं।
-लेखक दैनिक भास्कर, पटना के संपादकीय सलाहकार हैं।
surendarkishore@gmail.com