.रहीस सिंह
पिछले कुछ समय से भारत वैश्विक कूटनीति में तेजी लाया है और वह जापान व चीन को लेकर जिस तरह से आगे बढ़ना चाह रहा है, उससे लगता है कि ये तीनों देश अब संयुक्त रूप से एशिया का नेतृत्व करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। यदि ये तीनों देश अपने परंपरागत ऐतिहासिक संघर्षों को भुलाकर भू-क्षेत्रीय विवादों के समाधान शांतिपूर्ण ढंग से खोजने की मानसिकता बनाने में सफल हो जाते हैं, तो ऐसी एशियाई कूटनीति का उदय होगा, जो वैश्विक कूटनीति को नई दिशा देने में समर्थ होगी, लेकिन क्या ऐसा हो सकेगा ?
हाल में कुछ चीनी विशेषज्ञों की तरफ से यह राय रखी गई थी कि भारत, चीन और जापान एशिया को नेतृत्व प्रदान करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं बशर्ते कि वे अपनी एकजुटता का परिचय देते हुए रणनीति तैयार करें। उनका कहना था कि आने वाले समय में यूरोपीय संघ की तर्ज पर एशियाई संघ के निर्माण के लिए तीनों देशों का साझा नेतृत्व जरूरी है।
सवाल यह उठता है कि यदि ब्रिटेन के उपनिवेश संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन में साझा रणनीति बन सकती है और ये दुनिया के भौतिक व प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की साझा रणनीति अपना सकते हैं। लंबे वक्त तक दुश्मन रहे जर्मनी और फ्रांस मिलकर यूरोपीय संघ को नया आयाम दे सकते हैं। अमेरिका और जापान की दोस्ती जापान और प्रशांत क्षेत्र का नक्शा बदल सकती है तो फिर भारत, जापान और चीन इतिहास के उन अध्यायों को क्यों नहीं भुला सकते ?
भारत-चीन और चीन-जापान का इतिहास सम्भवतः उनके साझे सामर्थ्य के विकास के लिए बहुत हद तक उत्तरदायी है। साझा कूटनीति के विकास में सबसे बड़ी बाधा चीन और जापान के मध्य भू-क्षेत्रीय विवाद है जिसमें सेंकाकू द्वीप समूह तथा तेल क्षेत्र शामिल हैं। यह विवाद जापान और चीन के ‘एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक सी जोन’ को आच्छादित करता है। इसके लिए जापान चीन को दोषी मानता है और चीन जापान को। जापान चीन का विवादित इतिहास भी है, जिसमें खासतौर पर जापान के पूर्व एशिया में किए गए सैनिक अभियान हैं जो उसने सैन्यवादी काल में किए थे। भारत और चीन में सीमा विवाद हैं। चीनी रेड आर्मी के जवान भारतीय सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, उसका पाकिस्तान प्रेम भारत विरोधी है और वह स्ट्रिंग आॅफ पर्ल्स की नीति के जरिये भारत को घेरने का प्रयास कर रहा है।
बहरहाल, अब तक चीनी महत्वाकांक्षाएं एशिया में अस्थिरता का वातावरण उत्पन्न करती रही हैं, लेकिन अब चीन को यह महसूस होने लगा है कि भारत और जापान के प्रति उसे अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। फिलहाल यदि ये देश इतिहास के कुछ अध्यायों को भुलाने की क्षमता विकसित कर लेते हैं और प्रतिस्पर्धी की बजाय सहयोगी बन जाते हैं तो एशियाई कूटनीति 21वीं सदी को एक नई दिशा देने में अवश्य ही सफल होगी। देखना यह है कि युवा भारत बूढ़े चीन व जापान की मानसिकता को बदलने में किस प्रकार की भूमिका निभा पाता है?
-लेखक आर्थिक व विदेश मामलों के जानकार हैं।
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