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लोककथाओं में उड़ान भरती बच्चों की उम्मीदें

7 वर्ष पहले
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.भासवती घोष
स्कूल के दिनों में हम बच्चे दादी मां से कहानी सुनाने का आग्रह करते रहते थे। कोई भी कहानी नहीं। एक खास कहानी। कहानी की बजाय दादी मां जिस तरह से चेहरे के हाव-भाव बनाकर और आवाज में उतार-चढ़ाव लाकर उसे सुनाती थी, वह हमें मोह लेता था। इस कथा-कथन की यह नाटकीयता प्रिंट में लाना कितना कठिन है, समझा जा सकता है।
हालांकि, फिलिस्तीन लोककथाओं के संग्रह ‘स्पीक बर्ड, स्पीक अगेन’ ने यही कर दिखाया है। 1970 के दशक में दो फिलिस्तीनी विद्वानों इब्राहिम मुहावी और शरीफ कनाना ने गैलीली, गाजा और वेस्ट बैंक अरबी लोककथाएं इकट्‌ठा करने का दायित्व उठाया और 45 लोककथाएं एकित्रत हुईं। ज्यादातर कथाएं महिलाओं ने ही सुनाई थीं। ये कहानियां ठंड की लंबी रातों में भोजन के बाद सुनाई गई हैं जब ज्यादा काम होता नहीं था और परिवार के लोग आस-पास बैठकर बतियाना पसंद करते थे।

इन कथाओं से दक्षिण एशिया की कथाओं का आश्चर्यजनक साम्य है। उनमें भी हमारी तरह शादी के समारोह हैं, जिनमें लोग शानदार वस्त्र पहनकर सड़कों पर नाचते-गाते जाते हैं। हमारे स्वयंवर की तरह उनमें सेवफल या रूमाल फेंककर वर चुनने की परंपरा भी मिलती है। इन कथाओं में भी गृहिणियां अपने पड़ोस से जरूरत पड़ने पर चीजें मांगती नजर आती है। हालांकि, यह क्षेत्र पुरुषों के वर्चस्व का है पर इन कथाओं में हमें वजीर की चतुर महिला, राजा की ऐसी पत्नी जो घोड़े पर सवार होकर अपने बेटे के लिए श्रेष्ठ पत्नी खोजने निकल जाती है, जैसी महिलाएं मिल जाती हैं। उनमें फरिश्ते जैसी प्रेमपूर्ण बहनें, पत्नियां और बेटियां हैं तो बेटे को लेकर पजेसिव मां, ईर्ष्यालू पत्नियां और धूर्त बेटियां भी हैं। फिर हमारी लोककथाओं की तरह उनमें परियां, भूत-प्रेत और राक्षस भी हैं। लोककथाएं की कई बातें हमें चकित करती हैं और लगता है कि ऐसा भी कहीं होता है पर क्या रोज की हमारी जिंदगी में कई ऐसी चीजें हमें इनसे ज्यादा अजीब नहीं लगती। जैसे पाकिस्तान में एक राजनीतिक दल के नेता अपने अनुयायियों के साथ मौजूदा सत्ता के खिलाफ बम व बुलेट प्रूफ लग्जरी कंटेनर में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। इस ट्रक में बिस्तर है, वॉशरूम है और एयर कंडिशनर तक हैं। अब बताइए!
आज की दुनिया में लोककथाएं और उन्हें सुनाना बीती बात जैसा लगता है। मेरी एक सहेली ने बताया कि लैटिन अमेरिका की यात्रा में उनकी पांच साल की बच्ची को यह जानकर धक्का लगा कि उससे छोटी एक बच्ची के पास खेलने के लिए कोई कमरा ही नहीं था। खिलौने तो घर की छत पर भरकर रखे थे। मेरी सहेली जब वहां गई तो मेजबान ने अपने दो कमरे का घर बताते हुए कहा कि हमारे पास बस यही है। वहां आठ लोग रह रहे थे। फिलिस्तीन में बच्चों के लिए इस तरह का खचाखच भरा दो रूम का मकान भी लग्जरी है। ऐसे में फिलिस्तीनी बच्चों के लिए अद्‌भुत मोड़ और उतार-चढ़ाव वाली कहानियां शायद एकमात्र ऐसा आसमान है, जिनमें संघर्ष व युद्ध से जर्जर उस देश के बच्चों की उम्मीदें उड़ान भर सकती हैं।
-लेखिका अनुवादक व कथाकार हैं।