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हे नेताओ! तुम्हारी दोस्ती... जैसे कोई कब्र में उतरता जाए

7 वर्ष पहले
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.नवनीत गुर्जर
सत्ता या कुर्सी के लिए होड़ मची है। महाराष्ट्र में। भाजपा -शिवसेना हो या कांग्रेस- राकांपा, एक-दूसरे को खुलकर धमका रहे हैं। असल झगड़ा है मुख्यमंत्री की गद्‌दी का। हर दल को ज्यादा से ज्यादा सीटें चाहिए ताकि जितने ज्यादा लोग जीतें, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावा भी उतना ही मजबूत रहे या दिखे। ज्यादा से ज्यादा प्रत्याशी उतारने की होड़ में इससे किसी को कोई मतलब नहीं है कि सीटों के उनके इस झगड़े को 15 अक्टूबर को वोट करने वाला आम आदमी किस रूप में लेगा! यह झगड़ा उसे अच्छा लग रहा है या बुरा?
खैर, जो लोग यह सोच रहे हैं कि चारों दल अकेले भी चुनाव लड़ सकते हैं, वे गलत हो सकते हैं, क्योंकि यह झगड़ा दिखावटी है। 27 सितंबर नामांकन की आखिरी तारीख है। इस दिन तमाम झगड़े सुलझ जाने हैं, क्योंकि दोनों ही गठबंधन अच्छी तरह जानते हैं कि एक-दूसरे के साथ न रहे तो सभी को नुकसान होना तय है। भाजपा जानती है कि उसके प्रत्याशी जिस सीट पर जीतते हैं, वहां शिवसेना के वोट भी उसे ही मिलते हैं। ऐसा ही शिवसेना के साथ भी है। राकांपा और कांग्रेस भी यह सच अच्छी तरह जानते हैं कि अलग-अलग लड़े तो एक-दूसरे के वोट काटने के अलावा कोई चारा रह नहीं जाता। इस डर से दोनों ओर के कुछ प्रत्याशी ही टिकट लौटाने पर आमादा हो जाएं तो बड़ी बात नहीं।
इसलिए तमाम झगड़े, धमकियां और दावे-प्रतिदावे सब नामांकन की आखिरी तारीख तक के हैं, इसके बाद सब भाई-भाई हो जाएंगे। प्रचार में इतनी निकटता दिखेगी कि आप विश्वास ही नहीं कर पाएंगे कि कुछ ही दिन पहले झगड़ने वाले यही लोग थे। दरअसल, राजनीति या नेतागिरी, अड़ीबाजी का ही दूसरा नाम है। फिलहाल चारों दलों में अड़ीबाजी का खेल चल रहा है। जो ज्यादा अड़ेगा, उसे फायदा होगा। जो बड़ा बनकर रहेगा उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है।
वैसे अकेले लड़ते हैं तो ज्यादा फायदे में राकांपा रहेगी, क्योंकि उसके पास सबसे ज्यादा अवसर होंगे। उसे शिवसेना से गुरेज नहीं है, क्योंकि वह तब ‘आपला माणुस’ की सेवा करने की कसम खा सकती है। भाजपा से भी जुड़ सकती है, क्योंकि मोदी जी ने रक्षामंत्री का पद अब भी खाली रख रखा है। ...और कांग्रेस तो राकांपा का बड़ा भाई है ही। इतने अवसर बाकी तीनों में किसी के पास नहीं हैं। शरद पवार राजनीति के बड़े खिलाड़ी हैं, वे हर तरफ से फायदे में हैं।
अंत में इस नेतागिरी और इन नेताओं पर एक व्यंग्य -
हे नेताओ!
तुम किसी खोह-खंदक से उपजे हो,
या गहरे पाताल से निकले हो!
तुम्हारी दृष्टि निरी तूफान,
दैत्यमय भी, देवमय भी।
तुम्हारी आंखों में सांझ भी, भोर भी,
सुगंध जैसे सांझ की आंधी, होंठ जैसे जहर का घूंट
तुम एक हाथ से खुशी बीजते हो, दूसरे हाथ से तबाही,
तुम्हारी छटा भयानक और दोस्ती...
...जैसे कोई कब्र में उतरता जाए।
लेखक दैनिक भास्कर, मध्यप्रदेश के स्टेट एडिटर हैं।
navneet@dbcorp.in